Wednesday, June 11, 2008

पिता को श्रधान्जली

बापू को नमन 

पिता के रूप में राष्ट्रपिता का स्मरण करता हूँ आजादी की सांस ले रहा हूँ नमन करता हूँ 
 
  हे युग पुरुष अगर तुम आज होते
हम एक दुसरे के कांधे पर सिर रख रो रहे होते

क्या आजादी का परचम इस लिए लहराया था
देश में काले अंग्रेजो का शासन,क्या तुमने चाहा था? 

तुझे आज अफ्रीका भी नमन करता है 
वंशवाद रंगभेद छोड़ वोह लोकतंत्र में विचरता है 

 नमन करता हूँ तेरी गोलमेज सम्मेलन की तस्वीर को नीलों से संग्राम और जेल की तदबीर को 
 
चौरीचौरा पे तेने अहिंषा का सन्देश दिया 
तेरी हिम्मत थी जो तुने आन्दोलन वापिस लिया 
  
हे राम के तेरे शब्द आज भी गूंजते कान में 
कोन याद करता गोडसे, स्वर्ग से क्षमादान दे 
  
सत्य अहिंषा बकरी चरखा तेरे निसान थे 
पूरे देश के भ्रमण ने दिए तुझे अनुमान थे 
  
तिलक गोखले पटेल नहरू ने तुझे सरहाया था
अंग्रेजों को तेरे असहयोग आन्दोलन ने थर्राया था 

 प्यारे बापू - देख तेरे चेले तुझे भूल गए 
खादी भूली चरखा भुला 
गाय बैल बछड़ा भूल गए 
  
जाति नस्ल आतंक का
 बवंडर छा गया है 
देश कर्जदार हो गया 
किसान आत्महत्या कर रहा है 
  
हे बापू आज पितृदिवस पर हम 
तुम्हे नमन करते है 
हे बापुओं के बापू 
 तेरे आशीर्वाद की कामना रखते है

Tuesday, June 10, 2008

चल गयी ...................?

आँखें भीगी हों या मुस्कुराती हुयी
पलकें भीगी हों बंद हों खुली हों या सुखी हुयी

जागते को जगा के दिखाओ
सोते को तो कोई भी जगा सकता है

आँखों ही आंखों में इशारा
खतरनाक हो भी जाता है

पलकों के झपकने से यार्रों
पिटने का सबब भी आता है

तुम्हे सुनाते है एक वाकया -
सोचना की वहां पर क्या हुआ

एक गाँव में शोर मचा
- चल गयी

भीड़ इकट्ठी हो गयी
जांच चालू की गयी
पुलिस को सूचना गयी
गारद आ के लग गयी
अखबार वाले आ गए
केमरा विडियो चालू किया
सवाल सबपे कायम हुआ

कहाँ चली
किस पे चली
क्यों चली
किस से चली

सब इधर उधर देखने लगे
एक दूसरे से पूछने लगे

तो एक लड़की ने पीछे से कहा
सबने इत्मिनान का सांस लिया

लड़की ने कया सुनाया?
जो सब को इतना मज़ा आया

कहा उसने - चल गयी
मेरे आशिक की आँख पडोसन से लड़ गयी

मैं आपे से बाहर थी
आशिक से खफा और परेशान थी

बेचारे आशिक की शामत आई थी
रात उसकी आँख दुखनी आई थी
पड़ोस से दवाई मंगवाई थी

दवा डलाते दर्द हुआ
आंखों का झपकना तल्ब हुआ

उसकी तो झपक गयी
और मैं ना जाने क्या समझ गयी
मेरी गलती हो गयी
माफी- आप को गलतफहमी हो गयी

गोली नहीं मेरे आशिक की आँख चल गयी

Monday, June 9, 2008

दादागीरी का जवाब

आज जिधर देखो उधर अंकल साम
चाहे पूर्व या पश्चिम जिधर देखो उधर दादागीरी मचा रहा है
यानी इस दुनिया में दादा का शोर हो रहा है
पता है दादा यह सब क्यू कर रहा है;
शायद दुनियाँ को दादा-११ सितम्बर का तोहफा बाँट रहा है!

नहीं यारों ........................

दादा बुढा हो गया है
दादा सठिया गया है
दादा कमजोर हो गया है
दादा खांस रहा है
दादा टूट रहा है
दादा बुझते चिराग की आखिरी लौ की तरह चमचमा रहा है
दादा तोहफा नहीं अपनी बदकिस्मती बाँट रहा है


देखो दादा का सांड इधर आ रहा है
दादा ही नहीं उसका गुर्गा भी गुर्रा रहा है
दादा की शह पर इतरा रहा है
हम पीटते हैं फिर भी गरिया रहा है

अफगान बांग्ला देख कर भी पगला रहा है
लालकिले पर चाय पीने का ख्वाब उसे आ रहा है
हम दादा के दादा - उस के बाप
...............वोह भुला जा रहा है

Wednesday, June 4, 2008

कामना

मेरे गुलशन के सुमन

मेरी आँखों के भुवन

मेरे जीवन के हमदम

मेरी सांसो की सरगम

मेरे दिल की धड़कन

मेरी कामना सरवम

तुम्हारा साथ रहे हरदम

राधे राधे



गौर श्याम की मंद हँसन लखि,
ऐसो कौन जो धीर ना धरैगो

मौर मुकट कटी काछनी तिरछी चितवन द्रग,
दौड़ आरती कुञ्जबिहारी की लैवेगो

मीरा सूर खान रस में रस,
सखियन संग ब्रिन्दावन में जाये बसेगो

जय बिहारी जय कान्हा जय गिरिधारी की
तान लगा द्रग नीर भरैगो

मंगल में जाईके, राधा वल्लभ दर्शन पाइके
ब्रिन्दावनवास सफल करैगो

बोली बिशाखा गोपियन के संग, राधाप्यारी के वचन,
ये प्रेमी भवसागर पार लगैगो

'सुन री सखी' तू कर पार ताल तल्लिया,
मेरो तो जीयो श्याम चरणों में ही बसैगो


राधे राधे

Tuesday, June 3, 2008

इल्तजा ए महोब्बत

उस ने दूर रहने का मशवरा भी लिखा है,
साथ ही दोस्ती का वास्ता भी लिखा है
उसने ने ये भी लिखा है मेरे घर न आना ,
और साफ लफ्जों में रास्ता भी लिखा है

यह तो सब इश्क के लटके झटके है,
इनकार में ही इसरार छुपा होता है

अपनों से ही रूठना और बेरुखी जतलाना,
माशूक को मनाने का पैगाम होता है

यह तो हमारे इश्क का जलवा है
बेवफाई नहीं प्यार का फलसफा है

तुम कदम रखती हो गर्म जमी पे दिखाने
को यहाँ अंदर हमारा दिल दहक पड़ता है

तुम्हे गुमा है अपने इश्क की बुलंदी का
तो यहाँ कोन जालिम कसर रखता है

आसमा में सीतारे लाखों होंगे
चाँद तेरे जैसा एक ही निकलता है

तू ही खाव्बों की मलिका मेरी
तेरी ही याद में हर पल गुजरता है

एक ही तस्वीर रक्खी है दिल के आयने में हमने बेशक
हम भी जरुर होंगे तुम्हारे दिल के किसी कोने में

हक़ और शुबा छोडो इशारा समझो
जानेमन उड़ के चले आओ

तुम्हारी इंतज़ार में दिल
मशाल की तरह जलता है

तुम्हारे इश्क की बरसात में भीगने को
....................यारां यह बेचारा तडपता है

बासर और पीसर [बादशाह और बेटा]

'बासर'(बादशाह) ताऊ तू चमार तो
मैं चमार का 'पीसर'(बेटा)

मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारा
तेरे नाम में छुपा है सारा

अम्बेडकर, कांशी माया का दुलारा
कुनबा कनकदास रैदास पेरियार का हमारा

देख मेरे साथ कौन खडा है

मेरा नसीब से तेरा आर्शीवाद बड़ा है

भगवान भी तू रहमान भी तू
पर पहिले इंसान है तू

लंका में जब पैर पसारा
हनुमंत ने विभीषण को उच्चारा

हम कोन बड जाती होई
बानर वंश कंदरा में सोयी

प्रात लेही जो नाम हमारा
पूछे ना कोई न मिले आहारा

जात पात पूछे न कोई'
हरी को भजे सो हरी का होई

इसलिए तुम मेरे संदिपन, वशिष्ट परशुराम हो
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु भगवान हो

दोनो खडे होंगे साथ गुरु और भगवान
पहेले पूजा करूं तेरी जो मिला दियो भगवान

Monday, June 2, 2008

चाँद के दीदार

तुम आये तो आया मुझे याद की गली मैं आज चाँद निकला
जाने कितने दिनों के बाद गली मैं आज चाँद निकला..........

आशिक तो माशूक में चाँद का अक्स देखता हैं
चाँद तो हुजुर का दिलबर है हर रोज़ निकलता है

आपको आयना नहीं मिला जो चाँद देखने का वक्त मिला है
चाँद का कसूर नहीं कि आशिकों को कभी कभी दिखता है

अगर इशारा हमारी और है तू हुजुर चाँद तो आप हैं
आप जब भी निकलोगे हमें खडा पाओगे हम आपके फर्मायेदार


आपका लिखा देखा तो हम लिखना भूल गए
आपके विचार समझे तो अपने विचार भूल गए

इश्क ने जालिम निकम्मा कर दिया
वर्ना आदमी हम भी थे काम के

तुम्हारी वाहवाही हमारा फक्र है, इनाम है
हम लिखते हैं तुम्हारे सदके , तुम बैठो दिल थाम के

मैं बैठ तो नहीं सकता हूँ
लिखने वक्त की मजबूरियो ने थाम लिया

आप् लिखते रहें डाक्टर स०
हम पढेंगे दिल थाम के

यह तो तुम्हारा जज्बा और रिश्ता हमें मदहोश करता है
हम तो दास्ताँ लिख गए मदहोशी में तुम्हे खुदा मान के

सत्य की राह


क्यों हीमाकत कर रहा है सच बयां करने की तू
देखना टकराएंगे माथे से कुछ पत्थर मीयाँ
पांव नंगे हैं, चले हम ग़र्म रेती पर सदा
और कांधों पर सलीबों का रह लश्कर मियाँ

बड़ी कठिन है डगर सत् पर चलने की

हर सत्यवादी ने दुनिया को झेला है
सच्चाई के लिए चलना अकेला है

परवाह नहीं हमें गर्म रेत के तूफान की
झूट के मुलम्मो की या पत्थरों के सैलाब की

अगर यह हिमाकत है तो भी ठीक है
सलीब कंधो पे हो सच्चाई की जीत है

बहुत झेला है हमने इस जालिम ज़माने को
आतंकियों को अत्याचारियों को झूठे और मक्कारों को

फीर भी आप जैसो ने हौसला बढाया है
साथ चल हमारे- आफ़तों से बचाया है

जान पर खेलेंगे हम आफते झेलेंगे
अहद हमारा है सच की डगर न छोडेंगे

Sunday, June 1, 2008

स्वाभिमान

क्यों मांगू मैं भीख सा जो है अधिकार मेरा !
क्यों स्विकारू मैं दया सा आत्म सम्मान है मेरा !
क्यों समझते हो स्वं को सबका सर्वेसर्वा !
मैं जन्मा नही जन्मी हूँ मैं
तो कोई अपराध नही है एक मानव हूँ मैं
और अधिकार है मेरा पाना एक मानव का सम्मान !




मांगने से कया भीख मिलती है
आम तौर पर दुत्कार मिलती है

आशीर्वाद और अधिकार में ज्यादा अंतर नहीं होता
एक मांगना ही पड़ता है गुरुजनों सेऔर दूसरा छिनना है पड़ता

जन्मा या जन्मी में क्या अंतर है
एक नर एक शक्ति है

हर युग में तानाशाह देखे हैं
उनके उत्कर्ष और पतन भी देखे है

हिटलर ने क्या पैदा हुई को ही मारा था
यवन कन्या ने तो चन्द्रगुप्त को स्वीकारा था

तुम मानव हो
जीना अधिकार है तुम्हारा

सम्मान की दुगनी हक़दार तुम
तुम ने मानव धरती पर उतारा

थमी जिन्दगी

रमता जोगी बहता पानी स्वीकार है
रुक गयी जीन्दगी का ये कोई प्रकार है ॥

जरुर कुछ कमी है तुम में
या किस्मत रूठ गयी है तुम में ॥

नहीं तो .....................
बाल बच्चा,
बीबी जच्चा
ताऊ बाबा
बापू - बच्चा
यार -दुश्मन
प्यार- नशेमन
मालिक -नौकर,
अल्लाह- ठाकर ॥

सारे के सारों को तुम में क्या बू आ रही है
या तुम्हारे करमो की गती सामने आ रही है ॥

गेसुओं का कैदी

मुझे तो तेरी आंखों ने इतनी पिलादी की मुझे होश नहीं
तुने कहते हैं किया मुझे बर्बाद मुझे खबर नहीं ॥

मैं तो तेरे गेसुओं का कैदी था तुने कब रिहा किया
मैं तो तेरी आँचल की खुशबू में डूबा था कब बाहर किया ॥

मैं तेरा आशिक था हुस्न की मलिका
गम नहीं तुने ही इस नाचीच को बर्बाद किया ॥

गुलशन में कितनी ही कलियाँ चटकी,
हर् आवाज पे मैं यह समझा तुने ही इरशाद किया ॥

तू मुडके देखेगी इस आशिक को जान ए मन,
तुझको मालूम होगा तुने खुद से ही बेवफाई का आगाज़ किया॥

Saturday, May 31, 2008

दिल और जान


दिल की लगी है बुझती नहीं
आंसूं की झडी है जो रूकती नहीं

हमने तो तराने गाये थे तेरे को खुदा जान कर
बाहों के ताज पहिनाए थे दिलरुबा जान कर

तू पत्थर का सनम निकलेगी यह गुमान ना था
किस्मत अपनी अपनी नहीं तो मैं आदमी था काम का

दिल की चिंगारी को दिलजला ही जानता है
शोले जब भड़के आशिक के दिल में 'जख्मी' ही जानता है

चाँद भी तू तारे भी तू आगोश में मेरे तो बहारें भी तू
तू दूर तो अमावस और पूनम की रात अगर पास है तू

खुदा-बुदबुदा


जवानी में हसीना का पसीना इत्र ए गुलाब
और बाद में उसका सीना चारमीनार ए हयद्राबाद

हमें मुर्गा मुस्सलम नहीं सिर्फ दावत ए शिराजी चाहिए
तुम्हारी सांसे नहीं सिर्फ साथ जीने की आसें चाहिए

कहाँ खुदा- कहाँ बुदबुदा
मैं तो इंसान हूँ इंसान ही भला


भूल गए सुबह की नसीहत जो शाम ख़राब करते हो
लड़ने जीने की बात करते हो दिल पे वार करते हो

तुम करो या मैं करू किसी का साझा नहीं है
काम सब को है इम्त्ज़ार में कृष्ण के राधा नहीं है

अक्स ए खुदा

हमारी वफ़ा तुम्हे दगा लगती है
हम तुम्हारे इशारे पर चले फिरभी तुम्हे तसल्ली नहीं मिलती है


हम तुम्हारा नाम लेकर निकले थे तुम्हारा दिदार करने
तुम्हें पाया रकीब की बाँहों में मायूस हो हम निकले

हर इंसान में सैतान और भगवान छुपा होता है
तुमने जो देखा वोह सही होगा उसकी कुदरत में उसका जलवा होता है

आशिक माशूक को बेटा बाप को, चेला उस्ताद को भगवान का दर्जा देता है
हवानियत साथ चले पर नाम अल्लाह, खुदा भगवान का ही लेता है

फितरत इन्सान की होती है रंग पलटने की, नहीं पलटने वाला तो भगवान होता है
तुम्हारे कर्म में शर्म क्यों है जब की कसूर पैदा करने वाले का होता है
तुमने अगर कुछ करामात करी हो तो वाकई में इल्जाम ए शर्म आता है

शुक्र कर उस उपर वाले का जिसने हमें इंसान बनाया
दीन इमान जज्बात रहम और महोब्बत का सबक पढाया

सोच, कहीं कुत्ता बनाया होता तो क्या होता?
भोंकता दूसरो पर, काटता अपनों को, और झुटन चाट रहा होता

नसीब हमारा की हम तुम्हारी आंखों में बसते है
मुकद्दर के सिकंदर हो जो तुम में अक्श ए इलाही नज़र आते है

Friday, May 30, 2008

दोस्त की जरुरत

ना रेगिस्तान को रेत की
ना आसमान को सितारों की
पर अच्छे इंसान को
अच्छे दोस्त की जरुर जरुरत होती है

राह में चलते कोई साथी मिल जाये तो
मंजिल समीप होती है
जीवन के सफर में हमराही और
उसके बाद भी चार कंधो की जरुरत होती है

क़यामत तो उस दिन आती है
जिस दिन दोस्ती बेमुरवत होती है

मारवाडी हमेशा व्यापार की बात करता है
माल लेता है दाम देता है

तुम भी गुरु मारवाडी हो
और हम भी राजस्थानी हैं
स्क्रैप दो
स्क्रैप लो
गलती हो तो माफ़ करो
पसंद आये तो तारीफ करो

इसही में जीन्दगी मस्ती से गुजर जानी है

जीवन और बुलबुला


पानी का बुलबुला सा जीवन
कुलाचे भरता है मन
बचपन से जवानी
आनी और जानी
बुलबुला देखने में सुंदर
मोटा ताजा दिलबर
फूटता है बुलबुला
निसान बाकी रहता नहीं तब
जीन्दगी और बुलबुले का फर्क
जीते जी नाम मरने के बाद अमर

Thursday, May 29, 2008

बेमौसम बरसात

जिस नारे से गौरों के दिल दहलाये
वन्देमातरम गान हमें क्यों याद नही
मेरठ मे जो क्रान्ति दूत बन ललकारा
मंगल का बलिदान हमें क्यों याद नही
देख वीरता गौरे भी थे घबराये
झांसी वाली शान हमें क्यों याद नही
अजीमुल्ला रंगो जी नाना टोपे
नायक बडे महान हमें क्यों याद नही
लाल किले से जफर क्रान्ति उदघोष किया
पुत्र किये बलिदान हमें क्यों याद नही
सन संतालीस नया सवेरा लाल किला
तीन रंग का मान हमें क्यों याद नही।


वन्दे मातरम हमें याद है।
शहीदों की कुर्बानिओं के रंग हमें याद हैं॥

नेताजी का तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा' याद है।
नारा ए बजरंगी हर हर महादेव भी हमें याद है॥

लाहोर की शांती बस और कारगिल भी याद है।
इंदिरा का बांग्ला संग्राम और अटल का अणुपरीक्षण भी याद है॥

कुछ नहीं भूले हमें सब याद है।
लेकीन हमें बड़ा दुख है और रंज आज है..

तुम अपने गुरु को याद करा रहे हो नौजवान ।
तुम्हारा शोर बेमौसम बे बादल बरसात है ॥
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Wednesday, May 28, 2008

तुम्हारा सोचना और हमारा मरना

इस से बढ़ कर,मैं क्या ज़ब्त की मिसाल दूं
वो मेरे पहलू में बैठ कर, बहुत रोया किसी और के लिए


मिसाल तो तुम देती हो हमारी
जबकि हम तो खोये थे तुम में हमें तो गुमान भी नहीं
तुम क्या जाग रही थी हमारी बाहों में, किसी को याद करते,
जो हमारे इश्क का अहसास ही नहीं

अरे वोह आंसू तो तुम्हारे बिछड़ने की सोच से ही निकल पड़ रहे थे
तुम जग ना जाओ, कंधे से सिर न हटाओ,
इस लिए हम चुप चुप सिसकियाँ भर रहे थे


तुझसे बिछड़ कर ओ मेरे बेखबर
में नजाने किस किस की हो गई हूँ


यह तो हमें मालूम था तेरा जलवा
तुझे खुद ही नहीं पता तू किस किस के आगोश में सो चुकी है
तू एक के साथ या हो सो के हाथ,तू तो हम से दूर हो चुकी है


इक उम्र से यही है मेरे दिल के आरजू
वो सामने बैठा कर मुझे देखता रहे


अल्लाह पर ऐतबार कर, अच्छे कर्म कर, वफ़ा कर वफ़ा ले
हालात हमारे भी ऐसे ही हैं तू सामने हो और दम हमारा निकले

होसला तुझ को न था मुझसे जुदा होने का
वरना काजल तेरी आंखों मैं न फेला होता


तुझे बहुत गुमा है अपनी खूबसूरती का जो काजल की बात करती है
रात तेरे साथ गुजारी थी आँखों ने
कितने ही आंखों ही आँखों के इशारो में,
जगह ही कहाँ बची थी जो वोह वह्ना रुका होता

जिंदा जब तक रहेंगे आपके दिल में रहेंगे
दर्द ए जीगर जालिम होता है दवा हम करेंगे

दोस्ती के लिए जान देने का जज्बा रखते हैं
मरने के बाद भी कसम आपकी यादो में बसके रहेंगे

साकी और मयखाना

अल्फाज बयां ही करते है, दम तो बयां करने वाले में होता है
दिल को दिल की कशिश परदे में भी होती है रूबरू होने में क्या रखा है

साकी तो मयखाने में जाम लिए पैगम्बर होती है जैसे मूर्ति बुतखाने की
बुत की पूजा दूर से करो जनाब होटों से लगाने में क्या रखा है ॥

साकी का तो काम है गुस्ताखी करना और दीलों
को
तोड़ना
तुम आँखों से प्याले चटकाते रहना ॥

जब तक जेब में माल है साकी इस्तमाल है
जहाँ माल खत्म है वहां साकी दुसरे की दुल्हन है ॥
इसलिए साहेब

कुफ्र से तौबा करो अल्लाह से नाता करो
बदी से टलो नेकी पर चलो गरीब की आह से डरो ।।

आह तो वोह चीज है जो मरी भी लोहे को गाल दे
तुम अल्लाह के नाम भरो तो वोह तो मोत को भी टाळ दे ॥


कमाई करो, जेब खाली करो, ऐश करो
भाभी जान से इश्क करो, दोस्तों पर नेमत करो ॥

हुजुर, हम तुम्हारे साकी और मयखाना दोनो हैं
रूबरू तुम्हारे आगोश में साकी के हैं ॥

होटों से लगा कर भी हमें नशा नहीं आया
तुम यह जाम खाली करो दूसरा पीछे आया॥

आह भरो यह प्यार करो अंगार बनो या पानी
साकी तो साझे की है इतना तो जानलो सानी॥

हाल ए आशिकी

शब ए बजम ए जलाल जो देखा तेरा,
आँखे झुकी थी मुह लाल था तेरा,

आशिकों का येही हाल होता देखा होगा ,
ज़माने ने हसीनो के पैर दबाते, जूते खाते देखा होगा

और भी बहुत से गम है इस ज़माने में
भूल जा आशिकी-गम भुला जा मयखाने में

दोस्ती और शायरी

काम पड़ने पर तो मतलबी याद करते है
हम तो वोह शह है जो दिल पर राज करते हैं

हिचकियों की परवाह किसे होगी
हम तो तुम्हारी तस्वीर साथ रखते हैं

शायर का हर धर्म- इमान होता है
वोह तो खुदा की तरह दुनिया का निगेहबान होता है

दुनियादारी की बात शायरी नहीं व्यापर होता है
सूरमा या कायर का तमगा हर शायर को स्वीकार होता है

इबादत करोगे वरदान पाओगे
मुलाकात करोगे सौगात पाओगे

हिसाब यारी में किस बात का
तुम हमारे हो तो शक किस बात का

हर खामोशी का कोई हमराज होता है
तन्हाई में मिलने में भी कोई राज होता है

दोस्ती किसी भी चीज से तोली नहीं जाती
तुम्हारी कसम हमें हर दोस्त पे नाज़ रहता है

तुम यारों के चौधरी हो तो हम भी यारों के कन्हैया है
जब दिल ही दे दिया एक दूजे को तो सारे साजन और सैया हैं

Tuesday, May 27, 2008

फितने से सवाल जवाब

तुम दुर्गा हो तुम शक्ति हो
तुम ही इंदिरा सोनिया सी राज करती हो

तुम रति रम्भा और उर्वशी हो
तुम ही मीरा हो तुम मेरी भक्ति करती हो

तुम बोर कहो या हंसी कहो
हमने तो इज्ज़त बख्शी है की तुम खुश रहो

दुःख तो हमरे पास नहीं फटकता
हमने तो तुमसे आशियाँ जोडा है

हम जैसे भी हैं वैसे ही हैं
तुम क्यों पेट पिटती हो कल्पती हो

दुखी मत हो। यह मेरी नीयती है।
मैं नारी शक्ती हूँ। जब भी मैंने
तुम्हे ठेठ उजाले से जोड़ा है
तुमने मुझे इसी तरह बोर कवीता सुनाई
और इसी तरह तोड़ा ह


हर इंसान की यही फितरत होती है
भर थाली देख भूख लगी होती है

मुझे तो कृष्ण कन्हैया ही कहते है हुजुर
गोपियों के झुंड पे तो इंनायत ही होती है

तुम अपना बताओ क्या हाल है
दिल में हम बसे सुबह से हमारा ही ख्याल है

तुम्हारी नज़र में हमारा छा जाना ही
हमारा मुकद्दर ए हाल है


ां हां हां हां हां हां हां .....
मैं क्यों घंटी बजाऊ ...मुझे क्या पडी है ..
मीत्तल जी तुम जो शरीफ बने बैठे हो शराफत के कुण्ड पर ।
सच कहती हू गाज बन के गीरते हो परियों के झुण्ड पर ।।



मुझे तो तेरी आंखों ने इतनी पिलादी की मुझे होश नहीं
तुने कहते हैं किया मुझे बर्बाद मुझे खबर नहीं

मैं तो तेरे गेसुओं का कैदी था तुने कब रिहा किया
मैं तो तेरी आँचल की खुशबू में डूबा था कब बाहर किया

मैं तेरा आशिक था हुस्न की मलिका
गम नहीं तुने ही इस नाचीच को बर्बाद किया

गुलशन में कितनी ही कलियाँ चटकी हर आवाज पे
मैं यह समझा तुने ही इरशाद किया

तू मुडके देखेगी इस आशिक को जान ए मन
तुझे मालूम होगा तुने खुद से ही बेवफाई का आगाज़ किया


सोज़-ए-गम दे मुझे उसने ये इरशाद किया
जा तुझे कशमकश-ए-दहर से आज़ाद किया
वो करें भी तो किन अलफ़ाज़ में तेरा शिकवा
जिनको तेरी निगाह-ए-लुत्फ़ ने बरबाद किया
इतना मानूस हूँ फितरत से, कली जब चट्की
झुक के मैंने ये कहा, ''मुझ से कुछ इरशाद किया?''
मुझको तो होश नहीं, तुम को खबर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझको बरबाद किया


वल्लाह कया बात है.......

जब भी तुम्हे देखता हूँ
उपर वाले की कुदरत नजर आती है
तुझे आती होगी बदबू
हमें तो तेरे में गुलाबों की मुलामियत और खुशबू नज़र आती ह
तू मौन है कायनात सून है
छत के उपर मून है
लोहे की खनक चाहे चांदी की चमक
तेरे हुस्न के सामने सब गौण है


जब मै अपनें ही जैसे कीसी आदमी से बात करती हूँ,
साक्षर है पर समझदार नहीं है ,ये सोच के डरती हू..
अब कुछ बोलो भी जनाब ..
जब मैं भूख और नफ़रत और प्यार और ज़िंदगी
का मतलब समझाती हूँ-
जब मैं ठहरे हुए को हरकतमें लाती हूँ -

..चुप्पी तोड़ो ना


तुम ठीक ही ड़रती हो
समझदार हो
अपनी औकात समझती हो
मतलब समझाने का दम भी भरती हो
कायनात पे हुक्म चलने का जज्बा भी रखती हो
मुर्दा में जान ठंडे में गर्मी भरने का दावा भी करती हो
हे नाजनीन, हे महजबीं ................
डरती हो हमारे हुनर से
चुप रहने का इशारा भी करती हो

हम तुम्हारा इशारा समझते है
तुम्हारी हर अदा पे हम जा निस्सार करते है

तुम कहोगे तो सारी जीन्दगी चुप रहेंगे हम ,
नहीं खेलेंगे तुम्हारे हसीं जज्बातों से
यह अहद आज हम करते है

कैसी लगी हा .....हा.......हा.....


कई बौखलाए हुए मेंढक
कुएँ की काई लगी दीवाल पर चढ़ गए,
और सूरज को धीक्कारने लगे
--व्यर्थ ही प्रकाश को लीये घूमता रहता है
सूरज कीतना मजबूर है की हर चीज़ पर एक सा चमकता है।
चाहे बदबू हो या "खुशबु"

Monday, May 26, 2008

दिल ए हाल ए दास्तान

सोज़-ए-गम दे मुझे उसने ये इरशाद किया
जा तुझे कशमकश-ए-दहर से आज़ाद किया

वो करें भी तो किन अलफ़ाज़ में तेरा शिकवा
जिनको तेरी निगाह-ए-लुत्फ़ ने बरबाद किया

इतना मानूस हूँ फितरत से, कली जब चट्की
झुक के मैंने ये कहा, ''मुझ से कुछ इरशाद किया?''

मुझको तो होश नहीं, तुम को खबर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझको बरबाद कियआ
--------
मुझे तो तेरी आंखों ने इतनी पिलादी की मुझे होश नहीं
तुने कहते हैं किया मुझे बर्बाद मुझे खबर नहीं

मैं तो तेरे गेसुओं का कैदी था तुने कब रिहा किया
मैं तो तेरी आँचल की खुशबू में डूबा था कब बाहर किया


मैं तेरा आशिक था हुस्न की मलिका
गम नहीं तुने ही इस नाचीच को बर्बाद किया

गुलशन में कितनी ही कलियाँ चटकी हर आवाज पे
मैं यह समझा तुने ही इरशाद किया

तू मुडके देखेगी इस आशिक को जान ए मन
तुझे मालूम होगा तुने खुद से ही बेवफाई का आगाज़ किया



हां हां हां हां हां हां हां .....
मैं क्यों घंटी बजाऊ ...मुझे क्या पडी है ..
मीत्तल जी तुम जो शरीफ बने बैठे हो शराफत के कुण्ड पर ।
सच कहती हू गाज बन के गीरते हो परियों के झुण्ड पर ।।

हर इंसान की यही फितरत होती है
भर थाली देख भूख लगी होती है

मुझे तो कृष्ण कन्हैया ही कहते है हुजुर
गोपियों के झुंड पे तो इंनायत ही होती है

तुम अपना बताओ क्या हाल है
दिल में हम बसे सुबह से हमारा ही ख्याल है

तुम्हारी नज़र में हमारा छा जाना ही
हमारा मुकद्दर ए हाल है

वल्लाह कया बात है


जब भी तुम्हे देखता हूँ
उपर वाले की कुदरत नजर आती है

तुझे आती होगी बदबू
हमें तो तेरे में गुलाबों की मुलामियत और खुशबू नज़र आती ह

तू मौन है कायनात सून है
छत के उपर मून है

लोहे की खनक चाहे चांदी की चमक
तेरे हुस्न के सामने सब गौण है

कैसी लगी हां.....हां.......हां.....

मतलबी दुनिया


इस भरी दुनिया में कोई हमारा ना हुआ
गैर तो गैर सही अपनो का सहारा ना हुआ

उपर वाले को भी इन गलिओं से गुजरते हुए अहसास तो हुआ होगा
क्यों उसने बनाईं यह मतलबी दुनीया. जब किसीने नहीं पहिचाना होगा

भलाई करने वाले को बुराई मतलबी को मिठाई
प्यार करने वाले को रुसवाई कलजुग की येही रीत है भाई

चापलूसों की बातों में नेताओं के वादों में
रिश्वतखोरो के इरादों में, जात धर्म के भागो में
मिलावटीयों के धंधों में हसीना की कंधो पे
धर्म की दुकान पे नेताओं के इमान पे
भोग मस्ती के समुंदर में, रोटी कपडे की दौड़ में
अपने छुट गए सपने टूट गए इस मतलबी दौड़ में
आज इंसान इंसान को भूल गया
अरे उपर वाले तेरी कया बिसात -आज इंसान माँ बाप ही भूल गया

परवरदिगार तुझे कसम है तेरे चाहने वालों की
परम पित्ता परमेश्वर, मत सुनना इन मतलबी इंसानों की

जो भूल गए धर्म और इंसान को, देश और इमान को
देश बेचा धर्म छोडा पैसे को भगवान समझा,खा गए तेरे नाम को

तू आया तो यह जालिम तुझे भी रासन की कतार में खडा करदेंगे
कैसे सहेंगे, तेरे सामने तेरा अपमान, हम तेरे मुरीद, जान दे देंगे

..श्रीकृष्ण मित्तल

विश्वास की जीत

तूफानों में फंसी गयी दुनिया तो कया घबराना
तूफ़ान का तो काम ही है आना और जाना

तूफ़ान कई किस्मों के होते हैं कुछ दिखते कुछ छिपे होते हैं
कुछ उजाड़ जाते हैं बस्तियां हरी भरी फसलें तैरती किस्तियाँ
दिलों के तूफ़ान जीन्दगी भर का जख्म दे जाते हैं
तेरी लग्न के जज्बे हर मंजर पीछे छोड़ जाते हैं


इतहास गवाह है हर रात के बाद दिन निकलता है
हर तूफ़ान के गुजर जाने के बाद नया डेरा तू देता है
सिर्फ तेरे में विस्वास हो .......
कर्म का आगाज हो ..........
दिल में हिम्मत हो ...........
तरक्की का जज्बा हो ........
जीतने की तमन्ना हो ......
हर किसी का साथ हो ......
सिर पे तेरा हाथ हो ........

यकीं कर विस्वास कर ...........

कसम है इस भगवान की उसके जलवे और जलाल की
कि............
कोई तूफ़ान इस दो पाये के इंसानों को
मंजिल पाने को आगे बढ़ जाने को

....रोक नहीं सकता ....रोक नहीं सकता

विशाखा सखी

सखी मैं बावरी सपने में दिखत घनश्याम ।
रात सोलह श्रंगार कीये पिया को जपत कब लग गई लौ शाम ॥


दधि मटकी सर पर धरी ढूँढत श्याम थकी घुमत नंद्ग्राम ।
यशोदा घर गयी तिरछी नयनन सो चितवन देखी सोवत चौर घाम ॥

कहा कहूँ सखी रुकना सकी मैं शर्मा कर भगी छुट गयो नंद्ग्राम ।
लटक पटक दौडत बरसाने पहुंची निकलो नहीं जीयो प्रान ॥

पीछे पीछे नटखट सखा संग पहुचो करवे राधारानी को बदनाम ।
प्रान न निकले तन से चाह दर्शन की लीये आँखों में बसे सूर श्याम ॥

मैं कया जानू रात क्या भयो आँखों में ना नींद तन बिना प्रान ।
सखी तेरे चरणों पडूं वारि जाऊँ कहियो न किसी को मेरे जीवनधन केवल घनश्याम
राधे राधे .................

Thursday, May 22, 2008

राधा रानी के नयन रसीले

कांहा को निरख मंद हसत चितचोर तकत बैन छैलछबीले
बरसाने की गलियन में फिरत त्रिभंग वेश भरत गोपियन को डोले
राधा झाँकत खिड्कन ओट से श्याम बिहारी को पावत नहीं मन में बोले
चैन न आवत किशन बावरे बिना एक छन भी, वेग मिला "श्यामा" रसिक रस रसीले ॥

Wednesday, May 21, 2008

चाँद और तारे

एक अँधेरा लाख सीतारे ।
उलटे थाल में देखो उपर टंगे है सारे ॥

चाँद को देखते है वो तारे ।
जैसे हम घिरे हैं आफतों के मारे ॥

तम से ना वोह हारे ।
आफतों
से हम नहीं मारे ॥

दीन और रात साथ
साथ हैं ।
दुःख और ख़ुशी भी आस पास हैं ॥

कल की याद में कल नहो खोना ।
दुखों की याद में कभी नहीं रोना ॥

शाम होते ही आजायेंगे सीतारे ।
जैसे कोई आकर तेरी
राह
संवारे ॥

एक अँधेरा.....................
पता नहीं कोन पुकारे