मेरी बेगम ने झोंक दी हैं सालन में वो मिर्चें,
निवाला मुँह में रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,
शादी की ये तस्वीरें बड़ी मुश्किल से ढूँढी हैं,
मैं अब इनको पलटता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,
जमा-पूँजी मैं बिस्तर के सिरहाने रख के सोता था
वहाँ अब हाथ रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,
मेरी शादी मेरी लग्ज़िश थी या गलती थी वालिद की,
मैं बीवी से जब ये सुनता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं...
जब किसी यार की शादी में दुल्हन को रोते देखता हूँ विदाई पर
अपने यार के आने वाले दुर्दिन सोच आँखे भीग जाती हैं
जब समन्दर के किनारे चोंचे लडाते तोता मैना देखता हूँ मैं
उनका भविष्य सोच फिर से आँखे टपक जाती हैं
मेरे रिश्तेदारों की वोह करती खातिर और ताने मारती अपने को
सुनके देख के यार्रों आँखे पसीज जाती हैं
क्या क्या बताएं तुम्हे इन आँखों का राज
हमारी तो 'मौके' पर ही और उनकी तो 'बेमोके' छलकती जाती हैं
Showing posts with label Samayik. Show all posts
Showing posts with label Samayik. Show all posts
Friday, April 30, 2010
Saturday, April 3, 2010
अभिशापित श्रापित जीन्दगी
जीन्दगी का सब से बड़ा संताप
बाप बड़ा ना भैया
सबसे बड़ा रूपया
पैसे की छनक पर गौरी की मुस्कान न्योछावर
दौलत की धमक पर झुकते करते सिजदा सर झुका कर
एक तर्फफ़ रईस का कुत्ता भी गद्दों पर सोता है
एक तरफ मज़दूर का बच्चा स्तनपान को भी रोता है
नहीं उतरता दूध उस गरीब अबला की छाती से
नहीं खायी रोटी तीन दिन बीत गए बिना दिया बाती के
यह अभिशापित श्रापित जीन्दगी
कल सुबह होगी नयी फसल आएगी
इस आशा में इस निर्धन माँ की रात बीत जाएगी
नयी सुबह तो दरवाजे पर साहूकार खड़ा होगा
घर का सदस्य बैल बा बा कर रहा होगा
साहुकार तो रस्सा खोल लेगया
खेती का अब क्या होगा
यह कैसी अभिशापित श्रापित जीन्दगी
कैसी गुलामी कैसा शोषण
दो रोटी के वास्ते बिक गया यह रमणी का गोर तन
कैसा मौन कैसा बोल, गरीबी के तराजू में तुल गया मन
धिक्कारते पुर्वजन्मो के पापों को इस श्रापित अभिशापित दिन
ऐसी है करोड़ों भारतियों की जीन्दगी ......................
बेक़सूर बारिश
बारिश बिचारी का क्या कसूर
वोह तो है हमेशा मजबूर
उसका तो काम ही है बरसना भिगोना
कहीं सिर्फ पल्लू कहीं पूरा सराबोर
मिटटी भी बेचारी क्या करे
उस ने तो बारीश की आहट पाते ही होता है महकना
बेदर्द यह आँखे तरसती दीदार को किसी को
कभी कभी काम कर जाती हैं बारीश सा बरसाना
बारिश तो माशूक के सामने रख लेती है इज्ज़त
आंसुओं को ढक बूंदोंमें समेट लेती हें
कर मत नफरत तू बारिश से औ निशीत
यह तो आशिको की कल्पना, राहत और सहेली है
वोह तो है हमेशा मजबूर
उसका तो काम ही है बरसना भिगोना
कहीं सिर्फ पल्लू कहीं पूरा सराबोर
मिटटी भी बेचारी क्या करे
उस ने तो बारीश की आहट पाते ही होता है महकना
बेदर्द यह आँखे तरसती दीदार को किसी को
कभी कभी काम कर जाती हैं बारीश सा बरसाना
बारिश तो माशूक के सामने रख लेती है इज्ज़त
आंसुओं को ढक बूंदोंमें समेट लेती हें
कर मत नफरत तू बारिश से औ निशीत
यह तो आशिको की कल्पना, राहत और सहेली है
Thursday, April 1, 2010
मानव -प्रभु का वरदान
मानव धर्म में हमे सब कुछ लेना
चाँद देखना सूरज बनना और सीतारों से बाते करना
अपने पराये की बात नहीं पुरे विश्व को दिल में रखना
स्वार्थ परमार्थ की लम्बी कहानी
दोनो के बीच में बड़ी छोटी सी गिनती जानी
माँ को बेटे से बेटे को माँ से स्वार्थ की माँ होती क्या कोई सीमा होती है
लेकिन माँ के जीन्दा रहने तक और मरने के बाद भी सदगति बेटे से ही होती है
सन्यासी साधू को चेले से क्या आस होती है
फिरभी गुरु परम्परा गुरु दीवस गुरु दक्षिणा होती है
मानव धर्म तो स्वार्थ का नाम है
धर्म करता पुन्य कमाता उसे कहते इंसान हैं
राम रहीम रविदास कबीर तुलसी सूर रसखान
बखान गए महिमा नर नारायण की और परिभाषा-ए-शेतान
इसलिए इंसान पहीले फीर सार्थक जीवन यह प्रभु का वरदान
चाँद देखना सूरज बनना और सीतारों से बाते करना
अपने पराये की बात नहीं पुरे विश्व को दिल में रखना
स्वार्थ परमार्थ की लम्बी कहानी
दोनो के बीच में बड़ी छोटी सी गिनती जानी
माँ को बेटे से बेटे को माँ से स्वार्थ की माँ होती क्या कोई सीमा होती है
लेकिन माँ के जीन्दा रहने तक और मरने के बाद भी सदगति बेटे से ही होती है
सन्यासी साधू को चेले से क्या आस होती है
फिरभी गुरु परम्परा गुरु दीवस गुरु दक्षिणा होती है
मानव धर्म तो स्वार्थ का नाम है
धर्म करता पुन्य कमाता उसे कहते इंसान हैं
राम रहीम रविदास कबीर तुलसी सूर रसखान
बखान गए महिमा नर नारायण की और परिभाषा-ए-शेतान
इसलिए इंसान पहीले फीर सार्थक जीवन यह प्रभु का वरदान
Wednesday, March 31, 2010
मन की दौड़ .....................
पुरे एक माह के पश्चात्
फीर वापिस बच्चों के पास
दिल्ली मथुरा की चिलचिलाती गर्मी से निजात
और मैसूर की मधुर वादी में पुनह वास
दिल के कीतने टुकड़े होते हैं
एक उस के एक तुम्हारे करीब होते हैं
मथुरा में राधावल्लभ बिहारी जी द्वारकाधीश के दर्शन
गुरुशरनानंद जी जैसे निश्चल आत्माओं में विचरण
जीवन का एक विकट, अटल सफल परिक्षण
जीसे सोच सोच प्रफुल्लित होता यह मन
लेकिन घर से दूरनन्हे मुन्ने बच्चों की मुश्कान
अपनी छत, गृहलक्ष्मी द्वारा चाय के प्याले पर उतरती थकान
पिछले २० वर्षो के मित्रो साथिओं की खट्टी मीठी यादें फील्म सी दिखती जाती हैं
जीवन के इस पड़ाव में पुकारती बुलाती पुन :पुन: विचलित करती जाती हैं
यह मन का पवनवेग का एरावत खीच लाता है
दिलासे देता और बहाने बनाता घर पहुँच ही जाता है
हर बार लगती है यह अंतिम मथुरा यात्रा
लेकिन मानव धर्म,
मेरा करम
गोरक्षा में बढ़ते कदम
संकल्पों को पूरा करने का भरम
प्रेरित करता उठाता यह निश्छल ठिठुरा तन
और बढ़ चलते है कदम
कर्मस्थली की और दाब के निष्ठुर मन
फीर वापिस बच्चों के पास
दिल्ली मथुरा की चिलचिलाती गर्मी से निजात
और मैसूर की मधुर वादी में पुनह वास
दिल के कीतने टुकड़े होते हैं
एक उस के एक तुम्हारे करीब होते हैं
मथुरा में राधावल्लभ बिहारी जी द्वारकाधीश के दर्शन
गुरुशरनानंद जी जैसे निश्चल आत्माओं में विचरण
जीवन का एक विकट, अटल सफल परिक्षण
जीसे सोच सोच प्रफुल्लित होता यह मन
लेकिन घर से दूरनन्हे मुन्ने बच्चों की मुश्कान
अपनी छत, गृहलक्ष्मी द्वारा चाय के प्याले पर उतरती थकान
पिछले २० वर्षो के मित्रो साथिओं की खट्टी मीठी यादें फील्म सी दिखती जाती हैं
जीवन के इस पड़ाव में पुकारती बुलाती पुन :पुन: विचलित करती जाती हैं
यह मन का पवनवेग का एरावत खीच लाता है
दिलासे देता और बहाने बनाता घर पहुँच ही जाता है
हर बार लगती है यह अंतिम मथुरा यात्रा
लेकिन मानव धर्म,
मेरा करम
गोरक्षा में बढ़ते कदम
संकल्पों को पूरा करने का भरम
प्रेरित करता उठाता यह निश्छल ठिठुरा तन
और बढ़ चलते है कदम
कर्मस्थली की और दाब के निष्ठुर मन
Monday, March 29, 2010
भविष्य स्वप्न
भविष्य स्वप्न भूत मार्गदर्शक वर्तमान वास्तविकता
जो भूत में विचरता वोह इंसान स्वप्नों में जीता
आत्मविश्वास की कमी याने भविष्य की क्षति
प्रभु में विश्वाश भूत की हार की याद सफलता को चुनती
मनुष्य भगवान तो नही यहाँ तो उसे भी दायरों में जीना पड़ा
शंघर्ष उसने किया आपदाओं को जीता और भगवान् बना
संघर्ष तेरी नियति संघर्ष कर संघर्ष कर कामयाबी सामने खड़ी
तू पस्त हुआ, संघर्ष से मुह मोड़ा, फीर तेरी किस को पड़ी
जो भूत में विचरता वोह इंसान स्वप्नों में जीता
आत्मविश्वास की कमी याने भविष्य की क्षति
प्रभु में विश्वाश भूत की हार की याद सफलता को चुनती
मनुष्य भगवान तो नही यहाँ तो उसे भी दायरों में जीना पड़ा
शंघर्ष उसने किया आपदाओं को जीता और भगवान् बना
संघर्ष तेरी नियति संघर्ष कर संघर्ष कर कामयाबी सामने खड़ी
तू पस्त हुआ, संघर्ष से मुह मोड़ा, फीर तेरी किस को पड़ी
दिल ए दर्द ए नादाँ का क्या कहना
तेरा दर्द चाट गया मेरा बदन
कुछ ज़िंदगी ने पी लिया अन्दर तलक मुझे
..........
दिल ए दर्द ए नादाँ का क्या कहना
कुछ पी गया मेरा दर्द और तेरा सीना
जींदगी का सफ़र और उस के यह खुबसूरत पड़ाव
कुछ पल हमारे साथ कुछ पल अपने साथ बिताओ
यादों के झरोखे से जब झांकोगे
हमारी खुशबु आएगी हमे करीब पाओ
कुछ ज़िंदगी ने पी लिया अन्दर तलक मुझे
..........
दिल ए दर्द ए नादाँ का क्या कहना
कुछ पी गया मेरा दर्द और तेरा सीना
जींदगी का सफ़र और उस के यह खुबसूरत पड़ाव
कुछ पल हमारे साथ कुछ पल अपने साथ बिताओ
यादों के झरोखे से जब झांकोगे
हमारी खुशबु आएगी हमे करीब पाओ
वक्त कि हर् शह गुलाम
वक्त कि हर् शह गुलाम, हर कोयी इसे करता सलाम
मस्ती मे भुल जाता अपनो को, करता दुजो का जीना हराम
वक्त का मारा ठोकर खाता, मिलता नही उसे आराम
दुजे का किया वो भुगतता, दोषी सारा मुक्कदर और राम
नानक दुखिया सब सन्सार, दुख कट्ते मिल जुल हरबार
जब तुम रोते कोयी साथ ना रोता, ह्न्सते पुर सन्सार
गरीब की जौरु सब की भाभी, रइस का कुत्ता बिस्कुट खाता
इस दुनिया की रीत येहि, मरने वाले के साथ कोयी नही जाता
दिन के बाद मे रात अगर आती, तो रात के बाद दिन भी आता
फिर येह इन्सान अपने सुख के पल क्यो नही बाट बिताता
कह गये ग्यानि सारे,दुख बाट्ने वाले को सुख हि सुख मिलता
कर परवाह होगी परवाह ,येह सत्य मानव क्यो नही अपनाता
Tuesday, March 23, 2010
परमारथ का फिलसफा
बहुत हो गया किसी को देख कर दिल का धडकना
पीछे मुड कर देखो क्या कहो दिया और कितना
अभी कुछ बिछड़ा नही कुछ खोया नहीं
जीन्दगी का एक पल भी अगर स्वाति की बूंद तो मोती की कमी नहीं
सफलता कामयाबी हर जीव के लिए अलग होती है
किसी को एक बोतल मिल जाये उसकी जीन्दगी धन्य होती है
कोई एक मधुर मुस्कान पर जीवन न्योछावर करता है
कोई दुसरे की तरक्की देख दुखी और हार पर खुश होता है
गाँधी अफ्रीका में पिटके भी नई उछई पा गये
अहिंसा को हिंसा से लड़ा देश आज़ाद करा गये
देश याद करेगा जे.पी, लोहिया को जिन्होंने देश को दिशा दी
भूल नही सकते दीनदयाल, श्यामाप्रशाद को जिन्होंने एकात्ममानववाद की रचना की
भूलेंगे नहीं शेरपा को जिसने हिमालय विजय किया
धरा का सीना चीरता किसान किसीसे कम नही जो देश का पेट भर रहा
गुरु विनोद बिस्सा कम नही जो हमे सिक्षा दे रहे
रोज नए संवाद पैदा कर हमे आगे बढ़ा रहे
अंत में हर इंसान में देव दानव निवास करता है
हर औरत में माँ,बेटी,बहिन,प्रयसी,सीता , केकई का रूप होता है
मर्यादापुरषोतम राम ने बालीको बेकसूर स्वार्थवस मारा था
धर्मराज युधिस्तर ने भी अस्वथामा हथो - नरो व कुंजरा गुरुवध को उचारा था
क्या एक भी इंच धरती ऐसी है जहाँ कोई मरा नही
क्या ऐसा एक भी इंसान है जिसने चोरी करी नही
इस लिए जहाँ भी मौका पाओ
परमारथ का लुत्फ़ उठाओ -लुत्फ़ उठाओ ........................
--
डॉ. श्रीकृष्ण मितल
Sunday, March 21, 2010
अभिलाषा
बहुत मैं ने मंदिर धोके.
पीर पैगम्बर ओझे देखे
तीरथ नदिओं में स्नान किया,
अभिलाषा बतलाई और सवाल किया
मुझे अजर कर दो अमर कर दो
सब ने बतलाया`हाथ जोड़ के दो
पूरी होगी अभिलाषा, मार्ग बताया यह वरदान दिया
आने वाली नस्लें याद करें की इस धरा पर कोई हुआ
तुम्हे अमर होने की अभिलाषा तो सिर्फ एक बहाना है
मृत्यू अटल है मिलनी सबको, जिसको तो आना ही आना है
पूरी करनी अभिलाषा तो ,दीन दुखी का दर्द दूर भागना है
छोड़ मजहबपरस्ती- कर सेवा- जिससे भगवान को पाना है
जन्नत को नर्क बनाने वालों पर दावानल बन छा जाना है
धधको अग्नि दावानल जैसे तुम्हे कुछ कर के दिखाना है
जिनका दिल साफ़ नही और अग्नि सा जो जल धधक रहे
पहिचान उन देश द्रोहिओं को तुमने उन्हे अग्निकुण्ड में डुबाना है
धरा पर संघर्ष करवाने वालों को नंगा कर प्रेमपथ उनसे ही बनवाना है
आज धर्म के ठेकेदारों ने कहर ढाया उन्हें राह पर लाना है
तुम तो अमर हो जाओगे पर उन्हें इंसान बनाना है
बढे चलो मुड के ना देखो तुम्हे वीर गति पाना है
पूरा देश तुझे निहारे तू तो अमर होगया
यह मिटटी का चोला रहे ना रहे तेरा नाम तो सभी ने माना है
राम रहीम गोतम ना रहे पर क्या उनकी मौत हो गयी?
कर्म करे तू वैसे, फ़िर, तेरी अमर होने की अभिलाषा तो पूरी होगयी
डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल
पीर पैगम्बर ओझे देखे
तीरथ नदिओं में स्नान किया,
अभिलाषा बतलाई और सवाल किया
मुझे अजर कर दो अमर कर दो
सब ने बतलाया`हाथ जोड़ के दो
पूरी होगी अभिलाषा, मार्ग बताया यह वरदान दिया
आने वाली नस्लें याद करें की इस धरा पर कोई हुआ
तुम्हे अमर होने की अभिलाषा तो सिर्फ एक बहाना है
मृत्यू अटल है मिलनी सबको, जिसको तो आना ही आना है
पूरी करनी अभिलाषा तो ,दीन दुखी का दर्द दूर भागना है
छोड़ मजहबपरस्ती- कर सेवा- जिससे भगवान को पाना है
जन्नत को नर्क बनाने वालों पर दावानल बन छा जाना है
धधको अग्नि दावानल जैसे तुम्हे कुछ कर के दिखाना है
जिनका दिल साफ़ नही और अग्नि सा जो जल धधक रहे
पहिचान उन देश द्रोहिओं को तुमने उन्हे अग्निकुण्ड में डुबाना है
धरा पर संघर्ष करवाने वालों को नंगा कर प्रेमपथ उनसे ही बनवाना है
आज धर्म के ठेकेदारों ने कहर ढाया उन्हें राह पर लाना है
तुम तो अमर हो जाओगे पर उन्हें इंसान बनाना है
बढे चलो मुड के ना देखो तुम्हे वीर गति पाना है
पूरा देश तुझे निहारे तू तो अमर होगया
यह मिटटी का चोला रहे ना रहे तेरा नाम तो सभी ने माना है
राम रहीम गोतम ना रहे पर क्या उनकी मौत हो गयी?
कर्म करे तू वैसे, फ़िर, तेरी अमर होने की अभिलाषा तो पूरी होगयी
डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल
Saturday, March 20, 2010
प्राणी धर्म
प्राणी धर्म
वोह मुख क्या पाक जो सिर्फ राम रहीम का जप करे
या वोह हाथ जो मैल उठाता,लेकिन दूसरों की मदद करे .
कहते हैं गिलहेरी को राम ने उठाया था
उसे बड़े बड़े तपसियों से भी ऊँचा बताया था
मरा मरा जप के रत्नाकर बाल्मीकि बन गये
प्रकांडपंडित तिर्कालदर्शी त्रिलोकविजेता एक दिन लद गये
सिकंदर खाली हाथ आया था खाली हाथ ही गया
लेकिन हार कर भी पोरस अपना नाम अमर कर गया
क्या हिंदु क्या मुस्लिम क्या करुं धर्मो की बात
धर्म तो सारे प्रेम सिखाते पर हम फैलाये उत्पाद.
मानव, मानव के काम न आये ये तो नादानी है
बेअदबी,
इर्षा
मक्कारी,
नमकहरामी
गरूर,
शरूर,
बेइमानी,
बदकारी
का जीना,दुश्वारी और बेमानी है
इस मानव जीवन की बस एक कहानी है
कर भला हो भला,जो मान ले,वो ही प्राणी है
--
डॉ. श्रीकृष्ण मितल
.
वोह मुख क्या पाक जो सिर्फ राम रहीम का जप करे
या वोह हाथ जो मैल उठाता,लेकिन दूसरों की मदद करे .
कहते हैं गिलहेरी को राम ने उठाया था
उसे बड़े बड़े तपसियों से भी ऊँचा बताया था
मरा मरा जप के रत्नाकर बाल्मीकि बन गये
प्रकांडपंडित तिर्कालदर्शी त्रिलोकविजेता एक दिन लद गये
सिकंदर खाली हाथ आया था खाली हाथ ही गया
लेकिन हार कर भी पोरस अपना नाम अमर कर गया
क्या हिंदु क्या मुस्लिम क्या करुं धर्मो की बात
धर्म तो सारे प्रेम सिखाते पर हम फैलाये उत्पाद.
मानव, मानव के काम न आये ये तो नादानी है
बेअदबी,
इर्षा
मक्कारी,
नमकहरामी
गरूर,
शरूर,
बेइमानी,
बदकारी
का जीना,दुश्वारी और बेमानी है
इस मानव जीवन की बस एक कहानी है
कर भला हो भला,जो मान ले,वो ही प्राणी है
--
डॉ. श्रीकृष्ण मितल
.
Monday, January 5, 2009
एक और नयी सुबह का फूल ......................
बधाई नव वर्ष की और क्षमा करना मेरी भूल
कल सुबह भी देखा था खिलता मुस्कुराता फूल
हुयी शाम और ढल गया फूल
क्षण भंगुर यह दुनिया,
जानत सभी फिर भी गये भूल
पल की खबर नहीं, सामा १०० वर्ष का
प्यार को समय नही, झगडा कयामत का
फिर भी एक और नयी सुबह और उसका फूल
सोचता हूँ समय थमता नही
रात रूकती नही सुबह थमती नही
हर वर्ष फिर नव वर्ष की गूंज और हाथ में फूल
लेते भी, देते भी, दोस्त भी दुश्मन भी
राजा भी रंक भी, साधू भी संत भी
हिन्दू भी मुसलमा भी
सभी लगते इस नई सुबह का
खिलता मुस्कुराता चमन का फूल
फूल के साथ में कांटे जो दिखते नही
फिर भी दिल में दे जाते शूल
ऐसा ही कुछ हुआ गत वर्ष
जैसे बम्बई पर आतंकवादी हमला
शेएर बाज़ार का ४ लाख करोड़ पी जाना
पुरे विश्व का मंदी में घिर जाना
संसद में नोटों का लहराना
बेनजीर का हलाक ............और
श्रीमान १०% का सदर बन जाना
अर्र्रे ............दुनिया के थानेदार पर जूता चल जाना
किसी को फूल किसी को कांटे
किसी को शूल किसी को तोहफे
................एक और नयी सुबह .....और.....फूल
Saturday, October 25, 2008
गुरु को संदेश
गुरुदेव का आशीर्वाद बडी मुद्दत बाद मिला
जैसे डूबते जहाज को सिंदबाद मिला
हम तरसते थे गुरु ज्ञान पाने को
अपने क ख ग सुनाने और मार खाने को
एक समय ऐसा आया
गुरु ने हमे दिल से दूर हटाया
हमे मालूम ना हुयी त्रुटी हमारी
क्यों गुरुदेव ने हमारी यादें बिसारी
महीने कई बीत गये
गुरु हमे भूल गये
आज दिवाली आई है
शायद गुरुमन में प्रीती पुनः आई है
धन्य हुआ जीवन हमारा आप का संदेश आने से
मन गयी दिवाली, छूटे पठाखे, पेट भर गया खाने से
अब अगर भुलाया तो हम भी आपके चेले हैं
फिर नही कहना, बेसुरे, नाकारा, अलबेले हैं
तुम हमे छोड़ दोगे हम 'यह' दुनिया छोड़ देंगे
गुरु ही नहीं तो हम मान किसे देंगे
दीपावली पर आपने नया विषय उठाया है
बिल्कुल ठीक फरमाया है
Thursday, October 23, 2008
मानस शोर्य कामना
जिसने भी तुम्हारा नाम मानस रखा होगा
तुम्हारे नामकरण के बाद इतहास बन गया होगा
हम बचपन से सुनते हैं
खत्री बहुत सुंदर होते है
आज हम देख रहे है
सुंदर ही नही रचियक भी पा रहे हैं
इस उम्र में तुम्हारा यह हाल है
जल्द बडे हो जाओ खाली पडे हाल हैं
तुम्हे बहुत आगे जाना है
दुनिया को बहुत कुछ सुनाना है
आज स्कूल की पुस्तिका में स्थान मिलता है
कल विश्व प्रसारण में उच्च स्थान दिखता है
हर फिल्म में हीरो कवि और गायक होता है
सुना के अपनी कविता कविताओं को मोहता है
तुम्हारी भी उम्र आने वाली है
इस कला की जरूरत तुम्हे जल्दी ही पड़ने वाली है
अपने जैसी ही नायिका का वरन करना
जो तुम्हारी प्रेरणा बन सके ऐसी का चयन करना
कुछ वर्ष शादी के बाद अपने जैसा चिराग जलाना
उस भी मानस यानी मानसपुत्र खत्री बनाना
और क्या लिखें आज इतना काफी है
हमारा आशीर्वाद, आशीष, तुम्हारा साथी है
*********************
रामचरित 'मानस'
तेरे प्यार की क्या तारीफ करूं कुछ कहते हुए मैं डरता हूँ
कहीं भूल से यूँ ना समझ लेना की मैं तुम से महोब्बत करता हूँ
सात समुन्द्र पार से मैं लेता हूँ तुम्हारी बलैयां
तुम अयोध्यावासी मैं तो केवल रामभक्त हूँ भैया
हम हैं दंडकारन्य लंका के पडोसी महिसासुर की नगरी के दक्षिणवासी
तुम पढ़ लिख राम बनाना आना इधर बन सन्यासी
सीता जैसी कोमलांगी तुम्हारे साथ हो और लक्ष्मण जैसा भाई
हनुमान मिलेंगे यहाँ तुम बनाना तुलसीदास की चौपाई
लिखना पढेंगे सभी ध्यान से
तुम भी तर जाओगे हम भी पार उतर जायेंगे इस जहान से
तुम्हारे नामकरण के बाद इतहास बन गया होगा
हम बचपन से सुनते हैं
खत्री बहुत सुंदर होते है
आज हम देख रहे है
सुंदर ही नही रचियक भी पा रहे हैं
इस उम्र में तुम्हारा यह हाल है
जल्द बडे हो जाओ खाली पडे हाल हैं
तुम्हे बहुत आगे जाना है
दुनिया को बहुत कुछ सुनाना है
आज स्कूल की पुस्तिका में स्थान मिलता है
कल विश्व प्रसारण में उच्च स्थान दिखता है
हर फिल्म में हीरो कवि और गायक होता है
सुना के अपनी कविता कविताओं को मोहता है
तुम्हारी भी उम्र आने वाली है
इस कला की जरूरत तुम्हे जल्दी ही पड़ने वाली है
अपने जैसी ही नायिका का वरन करना
जो तुम्हारी प्रेरणा बन सके ऐसी का चयन करना
कुछ वर्ष शादी के बाद अपने जैसा चिराग जलाना
उस भी मानस यानी मानसपुत्र खत्री बनाना
और क्या लिखें आज इतना काफी है
हमारा आशीर्वाद, आशीष, तुम्हारा साथी है
*********************
रामचरित 'मानस'
तेरे प्यार की क्या तारीफ करूं कुछ कहते हुए मैं डरता हूँ
कहीं भूल से यूँ ना समझ लेना की मैं तुम से महोब्बत करता हूँ
सात समुन्द्र पार से मैं लेता हूँ तुम्हारी बलैयां
तुम अयोध्यावासी मैं तो केवल रामभक्त हूँ भैया
हम हैं दंडकारन्य लंका के पडोसी महिसासुर की नगरी के दक्षिणवासी
तुम पढ़ लिख राम बनाना आना इधर बन सन्यासी
सीता जैसी कोमलांगी तुम्हारे साथ हो और लक्ष्मण जैसा भाई
हनुमान मिलेंगे यहाँ तुम बनाना तुलसीदास की चौपाई
लिखना पढेंगे सभी ध्यान से
तुम भी तर जाओगे हम भी पार उतर जायेंगे इस जहान से
Monday, October 20, 2008
शब्दों में भी कंजूसी
आप को एक कंजूस सेठ की कथा सुनाते है
एक नगरसेठ नामी कंजूस था उसके एक साधू पधारे और उसे प्रभु आराधना का उपदेश दिया. उसने खर्च का रोना रोया तो मानसिक पूजा का तरीका समझाया.
सेठ ने रोज रात शयन से पहले मानसिक पूजा प्रारम्भ कर दी. पहिले गंगा जल से स्नान करा, पुष्प चढा. दीप दर्शन के बाद शक्कर का भोग अर्पण करने का अभिनय करता था. " जैसे चम्मच हाथ में हो शक्कर के पात्र से निकाल चढाने के साथ प्रभु भोग लगाओ" बोलता था.
एक दिन शायद सोने की हडबडी में गलती से दो बार भोग अर्पण कर बैठा.
तुरन्त ख्याल आया अररे क्या अनर्थ हो गया ? भगवान जी को तो ज्यादा शक्कर खाने से मधुमेय रोग हो जायेगा और तुरंन्त उच्चारण किया प्रभु एक चम्मच वापिस ली.
प्रभु को बड़ा गुस्सा आया और प्रगट हो उसका हाथ पकड़ बोले अरे कंजूस इस मानसिक अर्पण में भी तेरा कुछ लग रहा था क्या?
उधर कंजूस सेठ रो रहा और नाच रहा था. क्यों? इतने दिन शक्कर चढाई आज ही क्यों वापिस ली अगर पता होता की वपिस लेने से प्रभु प्रगट होते हैं तो पहिले दिन ही वापिस ले लेता
शक्कर भी लगी और प्रभु दर्शन भी देर से हुए
कैसी लगी कथा ?
एक नगरसेठ नामी कंजूस था उसके एक साधू पधारे और उसे प्रभु आराधना का उपदेश दिया. उसने खर्च का रोना रोया तो मानसिक पूजा का तरीका समझाया.
सेठ ने रोज रात शयन से पहले मानसिक पूजा प्रारम्भ कर दी. पहिले गंगा जल से स्नान करा, पुष्प चढा. दीप दर्शन के बाद शक्कर का भोग अर्पण करने का अभिनय करता था. " जैसे चम्मच हाथ में हो शक्कर के पात्र से निकाल चढाने के साथ प्रभु भोग लगाओ" बोलता था.
एक दिन शायद सोने की हडबडी में गलती से दो बार भोग अर्पण कर बैठा.
तुरन्त ख्याल आया अररे क्या अनर्थ हो गया ? भगवान जी को तो ज्यादा शक्कर खाने से मधुमेय रोग हो जायेगा और तुरंन्त उच्चारण किया प्रभु एक चम्मच वापिस ली.
प्रभु को बड़ा गुस्सा आया और प्रगट हो उसका हाथ पकड़ बोले अरे कंजूस इस मानसिक अर्पण में भी तेरा कुछ लग रहा था क्या?
उधर कंजूस सेठ रो रहा और नाच रहा था. क्यों? इतने दिन शक्कर चढाई आज ही क्यों वापिस ली अगर पता होता की वपिस लेने से प्रभु प्रगट होते हैं तो पहिले दिन ही वापिस ले लेता
शक्कर भी लगी और प्रभु दर्शन भी देर से हुए
कैसी लगी कथा ?
Monday, October 13, 2008
यु आर वैरी ग्रेट
तुसी सानु ग्रेट कहंदे हो
ग्रेटदा मतलब भी समझदे हो ॥
अस्सी त्वानू एक असली वाकया सुनांदे ने
तुवाणु ग्रेट दे अंदर दा मतलब समझान्दे ने ॥
इक यारनु भाभी जी तुस्सी बडे ग्रेट हो कहंदी आदतसी
सानु सुनके लगदी सी दिल ते छुरे घोपन सी ॥
अस्सी एक दिन पूछ बैठे
राज ओउद्दी गल दा खोल बैठे ॥
अस्सी पुछिया ओये सालेया सिर्फ भाभिआं ही क्यों ग्रेट होंदी हैं
अस्सी कया सोने नहीं या भाभिआं की ज्यादा दुद्द देंदी हैं ॥
सुन के अस्सी हैरान हुए,
उस कुत्ते दी गल ते हंस के लोटपोट हुए ॥
उसने अपने बचपन दा ईक वाकया सुनाया
सच्च था बचपन में उसे डकैतों ने था उठाया ॥
यारा जो हालात उन्होंने मेरी दो दिना में बनादेयी सी
वोह तो इन् भाभियाँ नु रोज सहना पडदा ही।।
इसही लिए इनाणु मैं भाभी जी यु आर वैरी ग्रेट कहंदा हूँ
मैं भी उसदिनतो जो ग्रेट कहंदा उनु भाभी वल समझदाहूँ ॥
कैसी लगी मेरे ग्रेट दोस्त को यह कहानी
अर्थ समझा या फोन कर पूछ ले जानी ॥
ग्रेटदा मतलब भी समझदे हो ॥
अस्सी त्वानू एक असली वाकया सुनांदे ने
तुवाणु ग्रेट दे अंदर दा मतलब समझान्दे ने ॥
इक यारनु भाभी जी तुस्सी बडे ग्रेट हो कहंदी आदतसी
सानु सुनके लगदी सी दिल ते छुरे घोपन सी ॥
अस्सी एक दिन पूछ बैठे
राज ओउद्दी गल दा खोल बैठे ॥
अस्सी पुछिया ओये सालेया सिर्फ भाभिआं ही क्यों ग्रेट होंदी हैं
अस्सी कया सोने नहीं या भाभिआं की ज्यादा दुद्द देंदी हैं ॥
सुन के अस्सी हैरान हुए,
उस कुत्ते दी गल ते हंस के लोटपोट हुए ॥
उसने अपने बचपन दा ईक वाकया सुनाया
सच्च था बचपन में उसे डकैतों ने था उठाया ॥
यारा जो हालात उन्होंने मेरी दो दिना में बनादेयी सी
वोह तो इन् भाभियाँ नु रोज सहना पडदा ही।।
इसही लिए इनाणु मैं भाभी जी यु आर वैरी ग्रेट कहंदा हूँ
मैं भी उसदिनतो जो ग्रेट कहंदा उनु भाभी वल समझदाहूँ ॥
कैसी लगी मेरे ग्रेट दोस्त को यह कहानी
अर्थ समझा या फोन कर पूछ ले जानी ॥
Sunday, October 12, 2008
हम सफर की याद
तुझे देख कर याद आते हैं कुछ जंगल के रास्ते
चलते थे हम तुम साथ साथ एक दुसरे के वास्ते॥
घर में कमरा एक और एक दरी होती थी
याद है रात को टांग कर दरी पार करते थे सदिओं के फासले ॥
दरी के इस पार तुम हम और उस पार दुनिया सोती थी
अररे, वोह भी क्या हसीन खुशनुमा मधुरात्रि होती थी ॥
आज दूरियां मिट गयी इंटरनेट आ गया
वेबकेम ने बंद कमरे का रहस्य भी दुनिया को दिखा दिया ॥
एक घर में चार कार, दस फोन होते हैं
हर कमरे में टी वी और टेप सजे होते हैं ॥
फिर भी दूरियां दिलों की इतनी हो गयी
मतलबपरस्ती इंसान की कहानी हो गयी ॥
कुरान, बाइबल, भागवत रामायण बासी होगयी
खता लह्मो ने करी, कहानी सदिओं की हो गयी ॥
आओ फिर उन लह्मो में खो जायें
वोही जंगल हो, हम तुम हों डाल के गलबाहें ॥
चलते थे हम तुम साथ साथ एक दुसरे के वास्ते॥
घर में कमरा एक और एक दरी होती थी
याद है रात को टांग कर दरी पार करते थे सदिओं के फासले ॥
दरी के इस पार तुम हम और उस पार दुनिया सोती थी
अररे, वोह भी क्या हसीन खुशनुमा मधुरात्रि होती थी ॥
आज दूरियां मिट गयी इंटरनेट आ गया
वेबकेम ने बंद कमरे का रहस्य भी दुनिया को दिखा दिया ॥
एक घर में चार कार, दस फोन होते हैं
हर कमरे में टी वी और टेप सजे होते हैं ॥
फिर भी दूरियां दिलों की इतनी हो गयी
मतलबपरस्ती इंसान की कहानी हो गयी ॥
कुरान, बाइबल, भागवत रामायण बासी होगयी
खता लह्मो ने करी, कहानी सदिओं की हो गयी ॥
आओ फिर उन लह्मो में खो जायें
वोही जंगल हो, हम तुम हों डाल के गलबाहें ॥
Friday, October 10, 2008
आज का तब्सिरा
नाव चलाने वाले मल्लाह को गम था तो बस एक ही गम था ।
साहिल पे आके किस्ती जहाँ डूबी वहां पानी बहुत कम था ॥
देश की नाव और मल्लाह का भी येही हाल है
नाव में बैठे यात्री परेशान बेहाल है ॥
साहिल सामने नजर आरहा लेकिन मल्लाह गाफिल सो रहा ।
नाव आधी डूब चुकी किस्ती में सुराख़ हो चूका ॥
शेर गीदड़ बन गये शेयर बाज़ार ढह गया ।
सोना सुर्ख हो गया रूपया सौ का आधा रह गया॥
टकटकी लगी है सबकी इंतज़ार है साहिल से राहत के आने की ।
नाव को और पथिक को जीवनदान देने और कायनात बचाने की
उठो हिम्मत करो, मत देर करो, सब छुट जायेगा
जब देश ही नही रहा तो देशवासी कहाँ जायेगा
काशमिरिओं को संभाला हम वतनो ने
हम अगर डूबे,भागे,तो ठौर नहीं प्रभुचरणों में
साहिल पे आके किस्ती जहाँ डूबी वहां पानी बहुत कम था ॥
देश की नाव और मल्लाह का भी येही हाल है
नाव में बैठे यात्री परेशान बेहाल है ॥
साहिल सामने नजर आरहा लेकिन मल्लाह गाफिल सो रहा ।
नाव आधी डूब चुकी किस्ती में सुराख़ हो चूका ॥
शेर गीदड़ बन गये शेयर बाज़ार ढह गया ।
सोना सुर्ख हो गया रूपया सौ का आधा रह गया॥
टकटकी लगी है सबकी इंतज़ार है साहिल से राहत के आने की ।
नाव को और पथिक को जीवनदान देने और कायनात बचाने की
उठो हिम्मत करो, मत देर करो, सब छुट जायेगा
जब देश ही नही रहा तो देशवासी कहाँ जायेगा
काशमिरिओं को संभाला हम वतनो ने
हम अगर डूबे,भागे,तो ठौर नहीं प्रभुचरणों में
Wednesday, October 8, 2008
जीवन की सच्चाई
कभी कभी दिल की आग को भड़काने के लिए ।
प्रितम के दिल में अपने को जानने के लिए ॥
दुनिया को अपने प्यार की किताब पढाने के लिए।
कसमे वादों को फिर से दोहराने-अजमाने के लिए ॥
चकोर ढूंढ़ता,चाँद भी बदली में छिप जाता है ।
दिवाना भी इसरार करवाने के लिए गुम जाता है ॥
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ ।
मैं ने भी कुछ ऐसा ही किया ॥
'या' शायद अनजाने में मै चाहने वालों से दूर हुआ ।
दिल बेकरार था दिन चैन रात नींद से मरहूम हुआ ॥
तपन मुझे भी उतनी ही चढी थी ।
आग इधर भी इतनी ही लगी थी ॥
रोज सोचता था यारों की हसने हसाने की बातें ।
रोज सुबह शाम जो होती थी बातें - मुलाकातें ॥
जब वापिस आया तो क्या देखा?
जो दम भरते थे महोब्बत का उन्हें नादारद देखा ॥
कुछ असली आशिको ने ढूँढ मचा दी थी ।
आर्कुट थाने में रपट लिखा दी थी ॥
आ कर मैं ने रपट की कार्यवाही देखी ।
उस पर अपनी स्याही से इबादत फैंकी॥
आपका शुक्रिया जो आप ने इतना मान दिया ।
अपने को हमारा हमदर्द साबित कर हमे गुलाम किया॥
प्रितम के दिल में अपने को जानने के लिए ॥
दुनिया को अपने प्यार की किताब पढाने के लिए।
कसमे वादों को फिर से दोहराने-अजमाने के लिए ॥
चकोर ढूंढ़ता,चाँद भी बदली में छिप जाता है ।
दिवाना भी इसरार करवाने के लिए गुम जाता है ॥
ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ ।
मैं ने भी कुछ ऐसा ही किया ॥
'या' शायद अनजाने में मै चाहने वालों से दूर हुआ ।
दिल बेकरार था दिन चैन रात नींद से मरहूम हुआ ॥
तपन मुझे भी उतनी ही चढी थी ।
आग इधर भी इतनी ही लगी थी ॥
रोज सोचता था यारों की हसने हसाने की बातें ।
रोज सुबह शाम जो होती थी बातें - मुलाकातें ॥
जब वापिस आया तो क्या देखा?
जो दम भरते थे महोब्बत का उन्हें नादारद देखा ॥
कुछ असली आशिको ने ढूँढ मचा दी थी ।
आर्कुट थाने में रपट लिखा दी थी ॥
आ कर मैं ने रपट की कार्यवाही देखी ।
उस पर अपनी स्याही से इबादत फैंकी॥
आपका शुक्रिया जो आप ने इतना मान दिया ।
अपने को हमारा हमदर्द साबित कर हमे गुलाम किया॥
Tuesday, October 7, 2008
हमारी कामना
खुश रहो
आबाद रहो
चैन से जीयो
सालों नाबाद रहो
हर सुबह नया सूरज देखो
हर रात नया चाँद ताको
हर पल को जीयो
यादों को दिल से ना बांधो
हर रात में दिन
हर गम में ख़ुशी
हर मा में ममता
हर माशूक में अदा
हर मन्दिर में बुत
हर काबे में खुदा
मिलता है चाहने वाले को
उठा नजर मिला जिगर
भूल जा गम
मना दीवाली रोज हर दम
हर दिन खुशनुमा होगा
हमे याद कर प्रेरणा ले रहा होगा
आबाद रहो
चैन से जीयो
सालों नाबाद रहो
हर सुबह नया सूरज देखो
हर रात नया चाँद ताको
हर पल को जीयो
यादों को दिल से ना बांधो
हर रात में दिन
हर गम में ख़ुशी
हर मा में ममता
हर माशूक में अदा
हर मन्दिर में बुत
हर काबे में खुदा
मिलता है चाहने वाले को
उठा नजर मिला जिगर
भूल जा गम
मना दीवाली रोज हर दम
हर दिन खुशनुमा होगा
हमे याद कर प्रेरणा ले रहा होगा
Subscribe to:
Posts (Atom)
