घास को उगने की और
घोड़े को खाने की स्वतंत्रता है।
शहजादे को गाली देने की,
वजीरों को खाने की विवशता है?
जब खाते हुए मुख कड़वा हो जाए तो
घास को रौंदने की भी आजादी है।
कितनी ही बार रोका, बचाया
घोड़ों ने घास को,
यह तो बेशर्म है इसकी धृष्टता है
जनता ने बार बार सिखाया सबक,
उखाड़ फेंका सब
फिर भी उग आती यह बेशर्म
शायद, इसकी धरती का असर है
या बीज में मिलावट का डर है।।
डा श्रीकृष्ण मित्तल
(कृपया इसे राउल के मोदी शाह को गद्दार कहने से ना जोड़ें)

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