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Sunday, April 18, 2010

बगावत -अहसास ए मोहब्बत

हाल ए दिल तुम तो सुना गये
इकरार ए जुर्म अपना दर्ज करा गये
महफ़िल तुम्हारे चिराग ए हुश्न से थी रोशन
बेजार थे कसीदे पढ़ रहे थे हम तुम्हे याद कर कर
तुम चिलमन में छिपे रहे हम यारों में घिरे रहे
तुम क्या समझे हमे इल्म नही
हम तो अपनी तड़प नगमों में पिरोते चले गये
शमा में तुम्हारा अक्श देखते दास्ताँ ए मोहब्बत सुनाते चले गये
आँखें कैसे बगावत करेंगी हमसे हे बेवफा तुम जल्वाफ्रोज़ ही ना हुई
बगावत भी अहसास ए मोहब्बत ही तो है हम तो कितनी बार इसे सहलाते गये

मैंने कब दर्द के ज़ख्मों से शीकायत की है
हाँ मेरा जुर्म है के मैंने मुहब्बत की है
आज फिर देखा है उससे महफ़िल मैं पत्थर बन कर
मैं ने आंखों से नहीं दिलसे बगावत की है
उस को भूल जाने की गलती भी कर नहीं सकती
टूट कर की है तो,सिर्फ मुहब्बत की है

Thursday, April 15, 2010

एक वक्त

किसी बहिन बेटी माँ की आबरू पर जान निसार करने का मादा
किसी को वचन देकर जान देकर भी पूरा करने का वादा
धरती, गौ माँ के लिए प्रान न्योछावर करने का जज्बा
अगर देवी प्रगट ना हो तो शीश चढाने की इच्छा

याद करें उन पृथ्वीराज, शिवाजी गुरुतेगबहादुर,छ्त्रसालों को
कैसे भूल जाएँ आज़ादी की जलती
लक्ष्मी, तांतिया, तिलक, गोखले लालाजी
जैसी मशालों को
वन्दे मातरम के नारे पर
गाँधी के इशारे पर
सुभाष के पुकारे पर
भगत के चिंघाड़े पर
खून खौल जाता था
हर औरत का जेवर उत्तर जाता था
दिल दिवाना- और दिमाग सब भूल जाता था

उन आज़ादी के दिवानो
देश की अस्मत के परवानो का खून ही क्या
पूरा बदन खोल जाता था
बदन ही नहीं पूरा
चमन ही डोल जाता था

यारों -आज भी एक वक्त है
रोटी कपडा और मकान फक्त है

हम दो और हमारे दो के नारे पर
ना बहिन
ना भाई,
ना बाप
ना माई
ना पड़ोस
ना नाती
ना यार
ना खुदाई
सिर्फ खुद और लुगाई

बाकी जज्बात जब्त हैं
किसे देशप्रेम, धर्म परोपकार से इश्क है

खून जुर्म होते देख भी खौलता नही
मुख अस्मतें लुटते देख भी बोलता नही
हाथ दान को उठता नही
पैर देव दर्शन को बढ़ता नहीं
क्योंकी सफेदपोश सोच के उठता, करता,बोलता, है
अपनी नोकरी, अपनी छोकरी अपनी टोकरी को बचाने को
दुसरे को बर्बाद करता,
अपनों से किनारा करता
ना जाने किस किस के पैर पड़ता है
ऐसा सफ़ेदपोश आज हर गलीकूंचे में डोलता-मिलता-दिखता है

Sunday, April 11, 2010

यादे

दर्द ए दिल इसका क्या कहना
कितने जख्म यारों ने दिए क्या गिनना
सिर्फ पुराने तजुर्बे देते हैं नसीहत
इस लिए पड़ती हैं यादे संजोना

हर वक्त नही मिलते तुमसे वफादार
यह यादें करती हैं वफा,जब जख्मी हो सीना
जख्म भी धरोहर हैं उन जालिम की
जब मिलें तो सुनादेंगे उन्हें दास्ताँ ए हसीना

Sunday, April 4, 2010

कब करेंगे प्यार


जिन्दगी उसकी जिसका यार
आज नहीं तो कब करेंगे प्यार
जैसे आज नगद कल उधर
प्यार के बिना जिन्दगी बैकार


बिल्कुल ठीक कहा मेरे यार
मारवाडी हम, देते नकद, करते नही उधार
बाहर झांक के देखा तो बिक रहा था प्यार
हम भी आज करेंगे तुमसे प्यार का इकरार
क्योंकी हम प्यार के मसयिया जीन्दगी भर बांटते प्यार

तमाम उम्र गुज़ारी फकीरी में कि खुदा मिलेगा,
जब मिला खुदा तो पूछते हैं कि तू शै क्या है.

फ़साना`ए जीन्दगी येही तो करता है
खुदा सामने तो मासुक की इबादत करता है
फकीरी मुयस्सर हुयी थी किसी की तड़प और duri me
जब मुलाकात हो गयी जान ए तमन्ना से
तो खुदा से उसका नाम पूछता है


Thursday, March 4, 2010

होली के हुल्लड

दिल तुम्हारा रहे जवान
और खेलो होली राधाओं से
चले शेर और मीठी जुबान
हम तुम्हारे आशिक
होली पर करते तुम्हे प्रणाम
आया जाओ मैसूर खेलेगे होली
भर के बाल्टी और पिचकारी बेजुबान
लाना भर के झोला रंग गुलाल मिठाई
मिलेगी भोजाई हमारे से .
भांग के नशे में, रंगों के अँधेरे में
कोन किसे पहिचानेगा
कोन किसे पुकारे गा
जो सामने आगयी उसे ही रंग डालेगा
भौजी किसे बीबी किसे,
आज तो हर गोपी भोजाई नज़र आती है
गली में निकलो तो सही
रंग की दुकान पर
हुल्लाडों की भीड़ नज़र आती है
चला रहे नैनों के बाण -
हाथ में पिचकारी तान
पुरे साल की जवानी आज ही तो रंग लाती है
छुपे के तान फिर देख कैसे गोपी बिना रंगे निकल जाती है


Tuesday, April 7, 2009

पत्थर दिल

पत्थर समजकर आज जो ठोकर लगा गए
समजकर कल वो शायद सर जुकायेगे।।

यह गलतफहमी क्यों हो गयी
की वोह सिर को झुकायेंगे ।

जो माँ बाप को पूछते नहीं
पत्थर कहाँ पूजने जायेंगे ।

ठोकर में पत्थर आया..................
कोई बात नहीं........

इंट ३ रूपये की आती है
नाली में पत्थर लगा कर पैसा बचाएंगे ॥

बड़ी कमजोर निकली तुम्हारी यारी रब्बा


"भूले है रफ्ता रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हमकिश्तों में खुदखुशी का मज़ा हमसे पूछिये !

बड़ी कमजोर निकली तुम्हारी यारी रब्बा
दो दिन नजरों से दूर हुए तो खुदकुशी की धमकी दे दी
कहीं हमारा जनाजा निकल जाता तो शायद .............
हुजुर तो जन्नत नशीं होती
अरे हम ऐसे वैसे आशिक नही
जो भूलने दे अपने रकीब को
अपना जलवा दिखाने को कभी कभी पर्दा भी डलता है
आज हमारा जलवा पूरा हिंद देख और सरहा रहा है
कुछ काम का बढ़ना, कुछ कामयाबी का और आगे बढना
कर गया मजबूर,और महरूम इस नाचिच को,
दोस्तों से दुआ सलाम करना
दिल चीर कर दिखा सकते नहीं वर्ना
तुम्हे अचरज होता
अरे वहां तुम्हारे अलावा और किसी का अक्श भी कैसे होता

इजहारे ऐ महोब्बत

सुबह शाम हमें याद आते क्यों हो,
सपनो में भी आके हमे रुलाते क्यों हो,
मेरा दिल तो सदा तुम्हारा तलबगार रहा,
फिर अभी इससे अक्सर तड़पाते क्यों हो,
ज़िन्दगी पहेले ही खड़ी है दोराहे पर,
इस पर भी तुम हमे भटकाते क्यों हो,
इश्क की इन्तहा बन गया है अब ये दर्द,
झूठे वादों से हमे बहलाते क्यों हो!!

किसी बेदर्द बहैया ने सवाल पूंछा हमसे
हमने कहा अक्स ए आईना देख
कितने दिलों को गुलाब की तरह कुचला तुने
कितने रकीबों इंनायत की दिखा कर तुने
हमने जब इज़हार ए मोहब्बत किया था
तुमसेतुमने दिखाई थी सड़कें और दुनियादारी की मुसीबतें
हम तो आज भी खडे इंतज़ार करते हैं अपने इश्क का
कब मिलेगी दो लह्मो की फुर्सत हमारी दिलरुबा को हमारे लिए
कभी आवाज देकर देखना जालिम
हम ही मिलेंगे इंतज़ार ए मेहरुबा के
कब्र के किनारे भी खडे हुए

Monday, October 20, 2008

इश्क की नियामत

हम अभी जवान है और मरने से डरते हैं
हम अभी जीना चाहते हैं क्यों की तुम पर मरते हैं

तुमसे मिलने को बहाने किसे चाहिए
हम तो तुम्हारी तस्वीर दिल में छुपा के रखते हैं

तुम कबूल करो या ना करो दुनिया को खबर है की
तुम और हम एक दूजे पर जाँ छिडकते हैं

आसमा है रकीब इश्क का
इसही लिए तो तुम हम कमरे में बंद रहते हैं

तुम हंसो हम देखें, हम हसें तुम देखो
येही इसरार खुदा से हम करते हैं

जख्म कोन जालिम भरना चाहता है
हम तो तुम्हारे दिए घाव इश्क की नियामत समझते हैं

जवाब के जवाब का जवाब

तुम्हारे हुस्न की तपस में
तुम्हारे इश्क की गर्मी में
तुम्हारे आंचल की ठंडक में
तुम्हारे हाथों के खनकते शोर में
तुम्हारी पायल की झंकार में
तुम्हारे हाथों से प्याले में

कोन जालिम बहरा, अँधा, गूंगा, पागल ना हो जाये

हम भी शायद उन्ही में से एक हैं
हुजुर इसलिए खो गये

शनि को कोन जाने
यहाँ तो पूरा हफ्ता ही सो गये

तुम्हारा कया हाल है ?
कम तो नही होगा

इतवार आये या ना आये
दिल में हमारा संदेश ही होगा
=======Reply to reply===========
क्या ये सच है ??!!
"आपकी खुशनुमा आहट दिन या रात
लाती हर किसी के चेहरे पर
दूध सी
गुलाब सी
लोबान सी
धुप सी
चाँद की चमक सी मुस्कुराहट !!"

शायाद ये सच ही है .....
नहीं तो.....
आपने ये कैसे नोट नहीं किया के आज sunday नहीं saturday है!!
मैंने ग्रीटिंग तो sunday का भेजा था!!
शायद ....
"दूध सी
गुलाब सी
लोबान सी
धुप सी
चाँद की चमक सी मुस्कुराहट में खो गए थे!!
हा हा हा हा ....
------Reply-------------
गुड मोर्निंग नमस्कार

सीता को देनी पडी अग्निपरिक्षा क्यूं
इम्तेहां गैर इत्फाकी का दूसरा नाम यूं


अंधियारों में भी खिलते है फूल
धूल में ही लगते है मुलायम फूल
आपकी खुशनुमा आहट दिन या रात
लाती हर किसी के चेहरे पर
दूध सी
गुलाब सी
लोबान सी
धुप सी
चाँद की चमक सी मुस्कुराहट
----------Message------------------
गुड मोर्नींग गुरु देव ....

इम्तेहाँ मुशीबत और भला ..
अधियारो में कोई है खिला ..
बेचैन बहारो की आहट..
चहरे में चित चितवन सजती
लोबान सी ख़ुश्बू मुस्कराहट

Tuesday, October 7, 2008

शिकायत - नई सुबह

तुम करो शिकायत हक तुम्हारा है
तुम से दूर रहे नसीब कसूर हमारा है ॥

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
दुसरे की गलती को भी ढोना पड़ता है ॥

अपने लक्ष्य को पाने, गोमाता को बचाने,
गोबर गोमूत्र के दाम ग्वाले को दिलवाने ॥

हम ने उद्योगपतियों को बुलाया था
इसे सत्य करने का बिदा हमने उठाया था ॥

आज इसके लिए खुद पहल कर बैठे हैं
मथुरा में गोवर्धन उद्योग की शुरुआत कर बैठे हैं ॥

दीपावली तक आशा है उत्पादन निकल आने
की पुरे देश में गोमाता के नाम का डंका बज जाने ॥

का गोबर से टाइल बोर्ड का पहला उद्योग होगा
आज पर्यावरण की समस्या - गोबर बिक रहा होगा ॥

हर गाय के गोबर का रु२० गोमूत्र का रु३० जिस दिन मिल जायेगा
कोन बेवकूफ उस गोवंश को कसाई के हाथ थमाएगा ॥

Thursday, September 11, 2008

एहसास ए इश्क

रात तनहा नही सितारों से भरी होती है ।
दूजे की बगल में हूर की चाहत भी किस्मत से शिकायत करती है॥

जिसको चाहते हैं नही मिलती यह नसीब या खेल कहो ।
आशिक की तबियत तो गमगीन नर्म करती है ॥

फूल ही नही हर कांटे की दास्ताँ अलग होती है ।
हिफाजत करे काँटा, कली हसीना के जुड़े में जा सजती है॥

कांटा चुपचाप फना हो जाता है इश्क का एहसास लिए
उसकी दिलऔजान जैसे फूल के पास गिरवी होती है ॥

कभी कांटे के दिन भी आते हैं
जब कली के साथ चुने, जुड़े में फूलों का सहारा बन पाते हैं ॥

अली इस अरमान से कली के साये में भटकता है
मिलेगी फतह नाकामयाबी से ना डरता है ॥

क्या हुआ जो पा ना सका रस ए गुल वोह अली
लुटाता मिट गया बेपरवाह इश्क ए कली ॥

उस अली और कांटे का एहसास किसी को नही
मजनू , फरहाद महिवाल के किस्सों का भी इल्म nhi ॥

इश्क के पुजारी उनको आज भी सिजदा करते हैं
कसम उनकी खाते और महोब्बत करते हैं ॥

कभी देखते इश्क लुटता दुसरे की बाहों में आह भरते हैं
माशूक जब दगा देता तब भी अहद इक तरफा करते हैं ॥

हैंयारां अकेले हो तन्हा हो तो याद करना
छोड़ खुदा का दर भी आएंगे इतना इतबार करना ॥

तारों से फरमाईश

यह बेकरारी है,सबब ए इंतजारी चाँद के प्यारों जागतेरहों
हमारी जानेमन आज आ रही है सितारों जागते रहो ॥

वोह आयेनही ऐसी बदकिस्मती नहिहमारी तुम
jab tak ना आये प्यारी रातहैभारी तारों साथ में रहो ॥

चाँदसेप्यारी जान है हमारी तारों रश्क ना करो
फक्र हमे चाँद हार गया बाजी तुम गवाह तो हो ॥

जाग रहे पाने को राजदारी इस बदख्याल में न रहो
कल ढिंढोरा न पीटना हमारे राज का कसम तुम्हे हो ॥

वोह आये या ना आए जागेंगे रात सारी तुम हामी तो भरो
चाँद छिपगया शर्मसे बादलो की ओट में उनका इस्तकबाल करके
...........अब तुम्हारी बारी आगे बढो ॥

लाना उन्हें हमारे गरीबखाने पे तारों की छाओं में ऐसा करम करो
सीता की बेकरारी अशोकवन में तारी ऐसी ही कोई जुगत करो ॥

Wednesday, September 3, 2008

कसम बेवफ़ा

लम्हा लम्हा वक़्त गुज़र जायेगा ,
चंद लम्हों में दामन छोड़ जायेगा।

अभी वक़्त है दो बातें कर लो हमसे,
पता नही कल कौन तेरी ज़िंदगी में आ जायेगा।।

तुम भूलकर तो देखो हमे
हर ख़ुशी तुमसे रूठ जायेगी।
जब भी सोचोगे अपने बारे में
खुद-बा- खुद याद हमारी आएगी ॥

जीनकी याद में हम दीवाने हो गए,
वो हम ही से बेगाने हो गए।।

शायद उन्हें तलाश है अब नए दोस्त की,
क्युंकी उनकी नज़र में अब हम पुराने हो गए ॥

ख्वाब देखा भी नहीं और टूट गए
वोह हमसे मीले भी नहीं और रूठ गए ॥

हम जागते रहे दुनिया सोती रही
एक बारीष ही थी जो साथ रोती रही।।

सुना है जब कोई याद करता है तो हीच्की आती है
अगर इस बात मैं थोडी सी भी हकीकत है ॥

नामुमकिन है की तुम्हारी हिचकी एक पल भी रुक जाय
हम सामने ना होंगे फ़िर भी हमारी याद आए और आँख ना भर आए ॥

Tuesday, August 5, 2008

कातिल मल्लिका

कातिल को कातिल कह क्यों मजाक करते हो
उनकी अदा पे मरते हो फिर क्यों शिकवा करते हो

वोह जहर भी पिला दें अपनी आंखों से कोई बात नहीं
उनके खुसबू और साए में जिन्दगी गुजर जाये तो खता नहीं

आग का दरिया उनका इश्क हमे तो पार तक जाना है
मल्लिका ए हुस्न तुम साथ तो जन्नत किसे जाना है ?

Saturday, July 19, 2008

माशूक और बीबी में फर्क

वो भी दिन थे की हमीं आयें हरेक बात में याद
आज हर बात में कह्ते हैं की हम भूल गए
बड़े भोले है, बड़े ढूध के धोये हैं आज
पी के जब प्यार में बहके थे कदम भूल गए
हमसे कांटे भी निकलवाये थे तलवों से कभी
आ के मंजिल पे सभी राह के ग़म भूल गए
अब तो कह्ते हो की भाते ही नही हमको "गुलाब"
आपके दिल् को कभी था ये वहम भूल गए

कल तक हम तुम्हारे आशिक थे आज खाविंद होते है
कल तक पसीना था गुलाब आज रोटी कपडा और मकान को रोते हैं

तुम आज भी दिल के पास हो दुनियादारी में फंसे तुम्हे खोते हैं
ड़र से तुम्हारे जानबूझ कर अनजान बन भूलना कबूल लेते हैं

हमारी वफादारी की कसम हर आशिक खाता है
अहद निभाने को इश्क अंजाम तक लाने को दूध नहीं
गंगाजल से धुले रोज तुम्हारी आंखों में खोते है

हम अकेले गुनहगार नहीं इस खुशनुमा अंजाम के
उस वक्त कदम दोनो के बहके थे नतीजे में संग होते हैं

याद है हमें तलवा और कांटे
जो लगे थे तुम्हे रिझाने को फूल लाते
याद है तुम्हारा उन फूलों का कबूल करना

और हमारे दर्द को सहलाना और सिसकना
कसम तुम्हारी याद है की

तुम्हे फूलों से नही हम से प्यार है

तुम गुलाब, हम कांटे, इश्क हवा हुआ,
आओ मिल दुनिया के दर्द बांटे

सात जन्मो के साथ की कसम को पूरी करने के खातिर

बनाया है नया आशियाना "हुजुर" तुम्हारे खातिर

कल तक हम तुम्हारे आशिक थे आज खाविंद होते है
कल तक पसीना था गुलाब आज रोटी कपडा और मकान को रोते हैं

लोग कहते हैं वो मुझसे मुझ्तालिफ सा है
मगर वोह जानते नहीं
मैं उस से रूठ जाऊं तोह..
वोह मुझसे रूठ जाता है ..


गलत ख्याल दिल को दुखा देता है
खोफ्नाक सपना नींद उडा देता है
तुम रूठी तो मनाने को कया कोई ताऊ आते है

फिल्म दिखाते, चाट खिलाते हम ही तो मनाते हैं

अगर वोह पूछ लें हम से की तुम्हे
किस बात का गम हे?
तो फीर................
किस बात का गम हें? ॥

गम था तो बस एक ही गम था
जहाँ किस्ती डूबी वहां पानी बहुत कम था ।


जो आँखों की जबान नहीं पढ़ते
उन्हें इश्क का हक नही ।
जो बातबात पर रुठते हैं उन्हें ,

हमारे
दिल टूटने का इल्म नही ॥

वो मुझे याद तोः करता है मगर यूँही जैसे
घर का दरवाज़ा किसी रात खुला रह
जाए॥

हमारे घर के दरवाजे तो कभी के उखड गए
तुम कब आओगी सोच सोच अरमान भड़क गए

आओगी तुम तो सितारों की छाँव होगी
चाँद रास्ता दिखायेगा गली सुनसान होगी

चौखट पर हम खड़े होंगे पलकों में छिपाने को
नज़रे उतार ले बलियां लोगो की नजरों से छिपाने को

Sunday, July 13, 2008

मजनू, फरहाद महिवाल

बेपरवाही से जीने का मजा कुछ और ही आता है
आँख बंद कर प्यार करने को ही इश्क कहा जाता है

जलने वालों ने बख्शा नहीं मजनू फरहाद महिवाल को
फन्हा होने तक मजबूर किया इश्क के दिवानो को

परवाह अगर करते तो मिसाल ए इश्क कहाँ बनते
आज तुम हम है और हम भी परवाह नहीं करते

कल रात तो सितम की रात थी
तुम उधर सोच में डूबे थे तो इधर भी येही बात थी

याद करते तुम्हारी और जालिम ज़माने को कोसते थे
कसम खुद ए इश्क की हम भी येही सोचते थे

तुम जब सामने आओगे तो क़यामत आ जायेगी
सब्र का बांध टूट जायेगा और गुस्से की बाढ़ आजायेगी

लेकिन कसूर तुम्हारा नहीं इस ज़माने का है
लगे हज़ार पहरे फिर भी जिगरा तुम्हरा जो आने का है

इस्तकबाल तुम्हारा करेंगे गुलदस्ता हाथ में होगा
तामिल रात का सोच, हंसी चेहरे पे, तुम्हारे हाथ में हाथ होगा

रात कैसे गुजरे तुम बताओ कम स कम इश्क का आगाज होगा
भूल जायेंगे ज़माने वाले, मजनू, फरहाद महिवाल को, कल हमारा होगा

Monday, June 23, 2008

बेवफा के ख़त का जवाब


मैंने एक ख़त लिखा था तुम्हे परेशानी में
कौन जाने की तुम्हे याद भी है की नहीं

मैंने लिखा था जरूरत है सहारे की मुझे
वोह सहारा जो तुम दो तोह इन्य्यात होगी

मैंने लिखा था मेरा कोई नहीं दुनिया में
मैं गई थी आकाश में बादल तनहा

जैसे बसती में किस्सी मोड़ पे पीपल तनहा
जैसे मुरझाया हुआ कमळ कोई पानी में

मैंने लिखा था ये तुझे मालूम न था
"मैं तुम्हे रूह की जागीर नहीं लिख सकती
ख़त तोः लिख सकता हूँ तकदीर नहीं लिख सकती

भूल जाना की खता होगी नादानी में
में एक ख़त लिखा था तुम्हे परेशानी में
कौन जाने की तुम्हे याद भी है या की नहीं


तुमने तो दसिओं ख़त लीखे ते इजहार ए प्यार को
कोन से ख़त को सुना रहे हो अपने दिल दार को

आज भी हमारी रात वोही ख़त पढ़ पढ़ गुजरती है
पढ़ते हैं ख़त और तस्वीर तुम्हारी सामने पसरती है

तुम्हारी परेशानी का सबब फरेबी है
वफादारी तुम से दूर पास लालच और बेसब्री है

इस लिए तुम कहानी सुनाते हो
जब दुसरे की बाँहों में जगह नहीं मिली
तो अपने खतों का वास्ता बताते हो

हम ने तभी तुम्हे आगाह किया था
चिडीया सोने का पिंजरा और सयाद को याद किया था

आज भी कुछ बिगडा नहीं
हम बदले नहीं तुम वापस वहीँ

तुम हसीं हम जवान वल्लाह कया बात है
ख़त मत लिखो चले आओ आज पूनम की रात है

तकदीर की बात करो मत आगाज ए तकदीर हैं हम तुम्हारे
सात जन्म तक का वादा रहा हम ही हैं पीर पैगम्बर तुम्हारे

Wednesday, June 18, 2008

पूनम


पूनम की रात आई कोई गीत गाने दो
तारों की बारात आई साजन को रिझाने दो

सुबह भोरों ने कलियों से प्रीत लगायी
और हमें भी आपकी खुशनुमा याद आई

यह तराना तुम्हारे दिल को छू जाने दो
दिल के जज्बात लिख डालो और नज्म बन जाने दो

अगर हमारी याद आये तो कोने में छिप आंसू ना बहाना ....
भूलीबिसरी या टूटी फूटी ही सही प्यार की आवाज आने दो

Tuesday, June 3, 2008

इल्तजा ए महोब्बत

उस ने दूर रहने का मशवरा भी लिखा है,
साथ ही दोस्ती का वास्ता भी लिखा है
उसने ने ये भी लिखा है मेरे घर न आना ,
और साफ लफ्जों में रास्ता भी लिखा है

यह तो सब इश्क के लटके झटके है,
इनकार में ही इसरार छुपा होता है

अपनों से ही रूठना और बेरुखी जतलाना,
माशूक को मनाने का पैगाम होता है

यह तो हमारे इश्क का जलवा है
बेवफाई नहीं प्यार का फलसफा है

तुम कदम रखती हो गर्म जमी पे दिखाने
को यहाँ अंदर हमारा दिल दहक पड़ता है

तुम्हे गुमा है अपने इश्क की बुलंदी का
तो यहाँ कोन जालिम कसर रखता है

आसमा में सीतारे लाखों होंगे
चाँद तेरे जैसा एक ही निकलता है

तू ही खाव्बों की मलिका मेरी
तेरी ही याद में हर पल गुजरता है

एक ही तस्वीर रक्खी है दिल के आयने में हमने बेशक
हम भी जरुर होंगे तुम्हारे दिल के किसी कोने में

हक़ और शुबा छोडो इशारा समझो
जानेमन उड़ के चले आओ

तुम्हारी इंतज़ार में दिल
मशाल की तरह जलता है

तुम्हारे इश्क की बरसात में भीगने को
....................यारां यह बेचारा तडपता है