Friday, October 2, 2015

जन्मदिन बापू और शास्त्री का प्यारा


आज फिर .........माँ की याद आई | 
मेरेजन्मदिन पर जो लेती थी बलाई || 


लगाती थी टीका काला आंख से काजल निकाल के|
करती थी तिलक आरती उतार के || 


बनाती थी सुबेरे से खीर मिठाई | 
मनाने को मेरा जन्मदिन उस दिन भाई || 


देश गांधी जयंती मनाने में लीन रहता था |
मेरे घर पर तो खीर पूरी खा कर 

बधाई देने वालो का जमघट लगा रहता था|| 

आज तो सिर्फ यादें बाकि रह गयी | 
ना माँ रही ना देश में वोह गाँधी जयति भी रही|| 


सिर्फ बापू की याद आती है | 
माँ स्वर्ग से बलियां लेती है|| 


मित्रो, अब तो सिर्फ तम्हारा सहारा है| 
बधाई दो या ना दो आज जन्मदिन 

बापू  और शास्त्री का प्यारा  है||



Tuesday, September 29, 2015

देशभकत मुसलिम बिरदार के सवाल का जवाब


मुकम्मल है इबादत मै वतन इमान रखता हूँ
वतन की शान की खातिर हथेली जान रखता हूँ
क्यों पढ़ते हो मेरी आँखों में पाकिस्तान का नक्शा
मुसलमान हूँ मै सच्चा दिल में हिन्दुस्तान रखता हूँ
कौन पढता है तुम्हारी आखो मे पाकिस्तान का नक्शा |
कोन नकारता है तुमहारी वतन परस्ती का जज्बा||
क्या तुम सरहद पर हिफाजत ए वतन को नही गये |
या इस मुल्क  के कायदेआजम या चीफ जस्टिस नही रहे||


तुम ही बताओ तुम्हे कोन सा अख्तियार नही |
क्या पढनेलिखने,तिजारत,खानेपहिनने,आनेजाने मे है, फर्क कहीं||
हम तो कहते कहते थक गये , हिन्दू मुस्लिम भाई भाई |
फिर भी तुम्हे ६८ वर्षों में यकीं क्यों नही आई||
इतनी आजादी तो नही किसी को पाकिस्तान मे|
इतना अमन,चैन महोब्बत नही देखा अरबिस्तान मे ||
औरत मर्द का यकीनी रिश्ता ऐसा नही मिलेगा इंगलिशतान मे | 
तुम चश्मेनूर हो सिरमौर हो, बगलगीर हो हिन्दुस्तान में||

आज हिन्दुस्तान जो वतन है तुम्हारा,तुम्हे पुकार रहा है |
वतन का कानुन तुम पर भी लाजिम है,करोअमल बता रहा है ||
मानो इसे शरियत के मानिंद और इज्ज़त करो हमारी |
मत काटो गाय यह है मादरेवतन बच्चों की पालक पयारी||

इकबाल लिखगये,आज फिर मिल कर गाएँ वोही गाना|
वतनपरस्ती, भाईचारे की दास्ताँ है यह तराना||
सारे जहान से अच्छा हिंदुस्तान हमारा|
हम बुलबुल हैं इसके यह  गुलिस्तान हमारा||
मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना|
हिंदी है, हमवतनहै, हिन्दुस्तान हमारा||
कुछ सिरफिरे हर कौम में होते है |
हर शहर में हर देश हर कोने में होते है ||
उनका काम होता है नफरत ग़लतफ़हमी फैलाना |
तुम समझदार हो या नहीं जो इन्हें नहीं पहिचाना ||
नहीं चाहते ये कौमी अमन, एकता भाईचारा|
वजह, इनकी रोटी, सियासत का यह नफरत ही सहारा||
यह मजहब के ठेकेदार, सियासतदार जो नफरत ही बांटते |
हिन्दू को सिख,मुसलमान और इसाई से अलग मानते||

लड़ो मत, आँखे खोलो, इन को पहिचानो|अमन चैन खुशहाली से रहना तो इनकी ना मानो ||


Monday, September 21, 2015

ख़ुशी कहाँ

हर ख़ुशी की हर गमी की कोई वजह होती है
 वोह नसीब वाले होते है जिन्हें बिना वजह ख़ुशी मिलती है. 

हम ढून्ढते है इसे विरानोमें, महफ़िलो
 में ना जाने कहाँ कहाँ, 
यह तो दिल में छुपी होती है.
 किसी को मिलती है विसाले यार में,
 किसी को उसके परिंदों को गिनने में ही मिल जाती है 
. हकिम लुकमान के पास भी इस इलाज ना मिला,
 इस मर्ज का इलाज़ अगर होता, 
तो ना सोहिनी होती ना महिवाल होता,
 ना हीर होती ना राँझा होता.

सुबह और शाम


बिहार का संग्राम



Friday, September 18, 2015

Wednesday, September 16, 2015

Tuesday, July 28, 2015

कलाम तुझे सलाम

जिस धरती से राम ने रावन को ललकारा था
जिस रामेश्वरम के कोने से सागर को फटकारा था

उस धरती पर एक अवतार ने जन्म लिया
जाती भेद को मिटा कर  देश प्रेम में जिया

गुदड़ी का लाल हम सुनते थे
तुमने इस कथनी को सच्च किया

एक अजातशत्रु सतयुग में शायद हुआ था
कैसा था क्या करता था किसी को नही पता था

एक अजातशत्रु ने कलियुग में जन्म लिया
इस राजनीति के दलदल में कमल की तरह जिया

अखबार बांटने से बचपन को जिया
जीवन की दौड़ में ना जाने कितना जहर पिया

तरक्की करता गया, आगे बढ़ता गया
सागर नापता गया, आसमान छूता गया

विश्व के विज्ञानिकों में देश को अमर करता गया
आसमान को चीरती अग्नि को रचता गया

जब सवाल आया पोखरण का तो कलाम का कमाँल देखा
दुनिया देखती रही गयी जब भारत का एटम फटा

इस से पहले १० आ चुके थे

राजिंदर जी,
राधा कृष्णन जी,
जाकिर, जी,
वेकट जी,
फकरू जी,
गिरी जी
शर्मा जी
इतहास में अपना नाम लिखा चुके थे

सभी का देश की राजनीती में अद्भूत स्थान था
देश की आज़ादी में भी योगदान था

यह तो प्रभु की विशेष रचना एक इंसान निराला था
विज्ञानिक था, खोजी था, विचारक था, मतवाला था

ना कांग्रेसी था ना संघी था , ना लाल था ना नीला था
ना हरा था लेकिन वोह तो माँ का लाल एकदम खरा था

बच्चो की तरह निश्चल वोह तो हर अज़ीज़ था
बच्चो के बीच में बच्चा - क्या चीज़ था?

गुरु था, पढ़ने और पढ़ाने का उसे शौक था
भारत का भाग्य विधाता अन्दर से राह ए सौध था

देश कैसा हो २०२० में ऐसा सोच दे गया
कुरसी का प्यारा ना था वोह उतरते ही अपने काम में जूट गया

देश का कोना कोना उसके ध्यान में था

तकनीक हो, चिकित्सा हो, शहर हो, ग्राम हो
खेत हो, खलियान हो
हर विषय उसके कलाम में था

चलते चलते गुरु पूर्णिमा आ गयी
इस गुरों के गुरु की अल्लाह को भी जरुरत आ गयी

देश को झंझोर गया, हर दिल अज़ीज़, हर दिल को तोड़ गया
अपनी लेखनी, अपनी यादें,
अपने कलाम अपना संगीत,
अपना सपना सच्चा करने को हमे सोंप गया

जहाँ से आया था उस ही भोले बाबा की गौद में पहुँच गया
गुरु पुन्नो की दिन ,,,,,,
यह धरती का लाल धरती की गौद  में सो गया

कलाम को सलाम .....सलाम ....सलाम




 

गुरुदासपुर के वीरो का जवाब


आज सरहद पार से फिर किसी ने पुकारा है ।
आतंकवाद के साये में धूर्त जलते पडोसी ने ललकारा है ॥
पूरा भारत घूम, सिमी-मुजाहिद्दीन, फिर धमका गया ।
गुरुदासपुर के सपूतों ने इस चुनौती को स्वीकारा किया ॥
आतंक के सौदागरों को चेतावनी का संदेश भिजवाया है ।
बम फोड ले, सडक खोल ले, हिंद-कश्मीर हमारा है ॥
६० साल से जालिम तुने मासूमों पर कहर बरपाया है ।
हम ने मुहतोड़ जवाब दिया और हर जगह तुझे हराया है ॥
खेमकरण और कारगिल के संग्राम की पिटाई तू क्या भूल गया ।
जम्मू हो या सूरत, हैदराबाद हो या बनारस, चाहे संसद, तेरी मौत भूल गया ॥
शायद खावायिश लालकिले पे चाय पीने की अभी भुला नहीं तू ।
शास्त्री के जय जवान की मार को आज भी याद कर तू ॥
राम कृष्ण गौतम गाँधी तिलक जवाहर के हम वंशज हैं जानले ।
सर पे कफ़न माथे पे तिलक, कमर कसे है हिंदकी सेना मानले ॥
हमने विश्व को मानवता का सन्देश दिया ।
पंचशील और सद्भावना को माना और जिया ॥
मजहबों से परे जा हर कौम को आदर दिया ।
इस देश में हर मजहब ने प्यार अमन को जिया ॥
हमने विश्व से आतंक ख़त्म करने का अहद लिया ।
बंगबंधुओं से, अफगानों से, पूछ हमने क्या क्या नहीं किया ॥
हमें लाहौर शांती की रेल भेजना आता है ।
तू छुरा घोंपे तो कारगिल भी करना आता है ॥
मुल्क में जमुरियत फिर से दस्तक दे रही है ।
बेनजीर को लुटा के इंसानियत भी रो रही है ॥
सात समुन्द्र दूर बैठा तेरा आका आज तुझे जान गया ।
हम कुछ भी ना करें दुनिया का थानेदार तो डंडा तान चुका ॥
कुरान-हदीस के पाक फतवों को भुला तू कुफ्र की वकालत कर रहा है ।
अपनों को भड़का के तू उन्हें क्यों नापाक नाकाम बदनाम कर रहा है ॥
दुनिया कहाँ से कहाँ तरक्की कर गयी तू भी इसे जान ले ।
झूट बोलना आतंक बोना- लाशे काटना गलत है मान ले ॥
रमजान के पाक महिने में सिजदाकिया तूनेअब कुफ्र से तौबा मांग ले ।
छोड़ दे यह ओछी हरकते विनाश की,तरक्की की डगर थाम ले ॥
मत ले इम्तहान नहीं तो तू पछतायेगा ।
कसम से हम उठ गए तो कौन बचायेगा ॥
भारत वासियों मत घबराना सब तुम्हारे साथ है ।
हम एकता, सावधानी, कठोरता, निरभ्यता, सद्भाव है ॥
हिम्मत रखना मत घबराना आतंकियों को सबक सिखाना है ।
जनगनमन, सत्यमेवजयते और वन्देमातरम गाना है ॥

Tuesday, June 2, 2015

श्री दीनदयाल जी उपाध्याय को नमन


जाने कैसा जादू भरा हुआ  
हे  दीनदयाल तुम्हारी वाणी में 
जाने कैसा आकर्षण छुपा हुआ 
हे दयाल तुम्हारे दर्शन  मे 
 मन कमल सा खिल गया हमारा 
पुष्प अर्पण हे  दीनदयाल तुम्हारे चरणो में 
हे माँ भारती के जगमगाते सितारे 
जीवन का आदर्श छिपा तुम्हारे कर्मो में 
एकात्म मानववाद के पुरोधा 
देश का कल्याण रचा तुम्हारे शब्दों  ने 
हे लोकतंत्र के सजग प्रहरी 
देख - देश  चल पड़ा  है तेरी दिखाई  राहों पे 
सारा भारत कर   रहा स्मरण अभिनन्दन तुम्हारा 
हे युग पुरुष, दीनदयाल 
 "मित्तल" का सत सत नमन तुम्हारे चरणो में 

Saturday, March 7, 2015

होली की रंग भरी बधाई

होली की रंग भरी बधाई 
गौमाता की जान बचाओ भाई 
यह समय फिर नहीं आएगा 
अगर गौवंश का श्राप असर दिखायेगा 
              .....मुझे इस अवसर पर इतना ही कहना है 
अमित- नरेंदर - नितिन -राज या प्रकाश राधामोहन या
वेंकैया - निर्मला भी शायद सुन रहे
समय बीत गया - कांटे गौवंश को चुभ रहे
राजस्थान - हरियाणा के बांग्लादेश सीमा पर बिक रहे
प्रतिवर्ष का हिसाब लगाओ तो ९ करोड़ कट रहे
रासायनिक दूध से देश का बचपन बिगड़ रहा है
रासायनिक खाद से फसल का दाम बढ़ रहा है
बिजली,पानी,यातायात,महिलाशक्ति,
ग्रामरोजगार का साधन आज बेभाव बिक-कट रहा है 
गौवंश भारत का भाग्य - समृद्धि - विकास है 
इसका निर्मम वध दुर्भाग्य-गरीबी- विनाश है
हे राम - प्रह्लाद को तुमने होलिका से बचाया था 
इस गौवंश की सेवा कर गोपाल तू कहलाया था 
आज यह निरह प्राणी तुझे पुकार रहा है 
कसाई से रक्षा की कर रहा पुकार है 

फिर इस पावन अवसर पर याद दिलानी है 
 आवो मिल कर प्रण करें - 
कसाई रूपी होलिका से गौवंश रूपी प्रहलाद की जान बचानी है
.

Saturday, August 2, 2014

गौवंश करे पुकार

गौवंश करे पुकार 
मुझे भी सुनले मोदी सरकार 

अमित पर अमिट विस्वास 
अब बच जाएगी मेरी साँस 

९ करोड़ प्रति वर्ष काटे जा रहे 
या सीमापार कर पाक बांग्ला भेजे जा रहे

देश को आज़ादी हमने दिलवाई थी 
इंद्रा की नैया भी हमने पार लगायी थी

देश के लुटेरो ने षड्यंत्र किया
हमे काटा और देश को पीया

हम देश ग्राम उत्थान के आधार
बिजली , पानी, ईंधन देने तैयार

खेती सस्ती हम कर सकते
विदेशी मुद्रा आयात रोक बचा सकते

युवा रोजगार का हम साधन
स्त्री शक्ति का करते पालन

हे मेरे नरेंदर, मेरे अमित
लिख डालो मेरी सुरक्षा का अध्याय अमिट

मै सुख उन्नति, प्रगति, स्वास्थ्य का करती वादा
पांच नहीं पचास वर्ष भी तू ही भारत भाग्य विधाता
जय गोमाता। .......... जय गौमाता

Thursday, August 23, 2012

जन्म दिवस पर मेरी कामना


जन्म दिवस वर्ष में एक बार आता है 
शायद इसी के कारण बहुत मित्रों यारों से नाता है 
बहुत अच्छा लगता है बधाई पाना 
जैसे सुखद मेघ का बरस जाना 
अगर आप पास होते तो मुह भी मीठा होता 
कुछ गिले शिकवे होते, कुछ उपहारों का आदान प्रदान होता 
शायद मिठाई कम पड जाती 
जिस तरह से मिली आपके शुभकामना संदेशो की पाती 
आपका प्यार मेरा सौभाग्य, मिलता रहे हर दम, मेरी  कामना  
करें मुख मीठा इस अवसर पर येही मेरी  आपसे प्रार्थना    
 

Saturday, April 14, 2012

यादगार जन्मदिवस



जीवन के मधुर पल 
जैसे हम धरा पर आये हों कल 
कितना मधुर सफ़र पूरा किया 
...........लेकिन अभी बाकी है कल
 
कल यानी नयी सुबह,
नया प्रभात   
एक और यादगार जन्मदिवस,
सब के साथ 
मित्र, बंधूबांधवों की सुभकामनाओं की सौगात 
होगी धरोअर 
और  प्रभु-गुरुचरणों में अरदास 

हमारी भी शुभकामनाएँ स्वीकार करना 
एक गुलाब हाथों में
और  गुलाबजामुन मुख में 
रखते हुए हमें भी याद करना 

Friday, December 10, 2010

हिंदी

भाषा  का  ज्ञान , भाषा  का  मान  
देश  धर्म  की  पहली  पहिचान 
समर्द्ध, सम्पन्न, हिंद का सम्मान 
आज अंग्रेजी के समक्ष हतमान
क्या जापान कम उन्नत है?
क्या रूस के स्पुतनिक चाँद पर नहीं पहुँचते?
गुलामी तो चीन ने भी झेली थी 
हमलावरों की ताकत क्या हमने अकेले देखी थी 
लेकिन हर मुल्क में नेहरु गांधी ना हुए 
यानी अंग्रेजी को लादने को साथी ना हुए 
इसलिए चीन, जापान, रूस, मंगोलिस्तान
जर्मनी हो या फ्राँस अपनी भाषा का मान रखते हैं 
दूसरी से परहेज नहीं पर अपनी को ऊपर रखते हैं 
संविधान के बताये वर्ष तो कभी के बीत गये 
अटल के हिंदी शब्द रास्ट्रसंघ में गूंज गये 
हमे भी आज सोचना होगा 

Wednesday, November 24, 2010

bihar ki jeet

दे दी पटकनी लालू राहुल को तुने बिना खडग बिना ढाल
पटना के रन बांकुरों तुमने कर दिया कमाल

कल तक नितीश- मोदी झेलते थे हमले बार बार
राज में ना बिजली ना रक्षा जनता बेकार

जयप्रकाश के पठे बिहार में  जन्मे दो सितारे
 शुशील और नितीश इस धरती के तारे

सामने थी बेकारी, अन्धकार,  और सूखा बाढ़ गरीबी लाचारी
साथ थी हिम्मत, हौसला, संगठन शक्ति और दयानतदारी

पांच वर्ष पहीले अंधकार विरासत में मिला था
सामने समश्याओं का बड़े बोलों का लम्बा सिलसिला था

लड़ते लड़ते निकल गये सरदारों के सरदार हिम्मत ना हार के
 आगयी परिक्षा जनता के दरबार परीक्षक केद्र सरकार के

कहीं राम
कही राहुल
कहीं माया
कहीं लल्लू   
कुरुक्षेत्र सज चूका था
बिहार चुनाव धधक चूका था

हमले हुए, तीर चले आरोप लगे
अपने पराये हुए, दिल में खंजर से लगे

जनता पर विश्वास था कर्म पर था भरोसा
साथ कमल सा कोमल और तीर सा कठोर था

शरद, शिवानन्द, ठाकुर, रविशंकर
शाहनवाज, शुष्मा, लालजी से साथ कर

भीड़ गये बौल हर हर महादेव अल्लाह हो अकबर
सामने लालू राबड़ी, रामविलास, राहुल सोनिया  एक से एक बढ़ कर

काम जीत गया, विश्वाश बढ़ गया
नतीजे आज आये तो नशा सा चढ़ गया

एक दो नही  २०० भी पार होगये
सामने तो तीन चार बीस बाईस रह गये

रन बाकुरो जीत को संभालना साथ निभाना
कमल खिला रहे, तीर पैना रहे जनता की आस पुराना 

Tuesday, September 28, 2010

राम जन्म भूमि विवाद

राम जन्म भूमि विवाद
देश को परतंत्रता की सौगात 
  
३० सितम्बर को क्या होगा? 

कुछ  टीवी पर आयेंगे 
कुछ  अख़बारों पर छाएंगे 
कुछ फ़ना, कुछ शहीद,  
कुछ गुमनामी में सो जायेंगे 

कुछ खोजेंगे अदालती फैसले में खामिया, 
कुछ प्रदेश और कुछ रास्ट्रीय सरकार में,
कुछ नाम लेंगे 'भगवा और हरे' सम्प्रदायों का  
कुछ माननीय जजों को ही खोज डालेंगे  

मुक़दमा आगे बढेगा, 

राम तो आज भी साये में हैं 
कल भी साये में ही पाएंगे 
फर्क नही पड़ता इस राम भक्त को 
राम तो हनुमान के सीने  में सर्वदा सुरक्षित, सन्मानित, 
नित्य सुमिरन पाएंगे 

यह कैसा गाँधी का रामराज 
जिसमे राम सीता के घर भी,
अदालती फैसले से पहिचाने जायेंगे

राम के स्थान भी कब्जा किये जायेंगे 
राम सेवक तो जीतेगा ही 
हम है तैयार 
१५०० इसवी - नहीं - लेकिन 
१९९२ फिर दुहराए जायेंगे 
राम मंदिर कब बनेगा ? 
सीता रसोई में भोग कब लगेगा ?

सुर्यवंश की जितनी पीढ़ी लगी थी एक भागीरथ पाने में 
क्या हमें भी इतनी पीढ़ीओं जीना,
 लड़ना, 
भुगतना पड़ेगा 
रामलल्ला को घर दिलवाने में

Tuesday, May 4, 2010

हार ही जीत का श्रोत..

जिन्दगी जिंदादिली का नाम है
रुकावटें मुसीबतें तो यूँ ही बदनाम है


आती हैं यह सब्र का इम्तहान लेने
आंकने ताकत और होसला तोलने


जो डर गया घबरा गया
या इनसे जी चुरा गया


मर गया जीतेजी मौत की जरुरत उसे नही
जो अड़ गया मैदान ए जंग में वोह हारा नही


पोरस हर के भी जीता था दुनिया जानती है
जीसे गौरो ने डिब्बे से फैंक दिया उसे आज महात्मा जानती है


लिंकन, वाशिंगटन गजनवी इंदिरा की हार कोन नही जानता
संघर्ष इनका जिसने विश्वनेता इन्हें बना दिया


ना थमे ना रुके रणबाँकुरे झुझ गये केसरिया बना पहिरके
ली प्रेरणा, संकल्प जीत का लिया बेपरवाह हार या जीत से


आज इतहास भर गया है इन की कहानिओं से
कल तुम्हारी भी चर्चा इनमे होगी तुम्हारे काम से


मत कर प्रवाह हार की जीत की कर्म कर कर्म कर
कर्म किये जा फल वोह देगा विश्वास कर

हार ही जीत का श्रोत..

Friday, April 30, 2010

छलकती आँखें

मेरी बेगम ने झोंक दी हैं सालन में वो मिर्चें,
निवाला मुँह में रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,


शादी की ये तस्वीरें बड़ी मुश्किल से ढूँढी हैं,
मैं अब इनको पलटता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,


जमा-पूँजी मैं बिस्तर के सिरहाने रख के सोता था
वहाँ अब हाथ रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं,


मेरी शादी मेरी लग्ज़िश थी या गलती थी वालिद की,
मैं बीवी से जब ये सुनता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं...


जब किसी यार की शादी में दुल्हन को रोते देखता हूँ विदाई पर
अपने यार के आने वाले दुर्दिन सोच आँखे भीग जाती हैं


जब समन्दर के किनारे चोंचे लडाते तोता मैना देखता हूँ मैं
उनका भविष्य सोच फिर से आँखे टपक जाती हैं


मेरे रिश्तेदारों की वोह करती खातिर और ताने मारती अपने को
सुनके देख के यार्रों आँखे पसीज जाती हैं


क्या क्या बताएं तुम्हे इन आँखों का राज
हमारी तो 'मौके' पर ही और उनकी तो 'बेमोके' छलकती जाती हैं

Saturday, April 24, 2010

इंडियन पैसा लीग

 इंडियन पैसा लीग से आई हवा 
मारिसस जा और माल कमा

नाम रखले अपना मोदी या ललित
साथ में जीसके राजे पवार और कितने भ्रमित 

कोई भी रिश्तेदारी निकाल ले
या गाँव का पुराना पड़ोस ही निकाल ले 

कुछ न मिले तो सौतेला ही सही
अपना नही तो दारू वाले का ही
 

सुबह कर बैठक टीम के मालिकों से
दिन में इंटरवियु इनकमटेक्स को दे 

शाम को तो मेच देखेगा
जिनके लिए फिक्स किया उनसे भी वसूलेगा
 
दिनभर फिक्स करे और डुबेगा  नशे में  
रात गुजरेगी स्वप्न सुन्दरियो के आगोश में 

फिरलालच का एक सरुर आएगा
सुनन्दा जैसी सुन्दरी को थरूर लायेगा
 

इंडियन पैसा लीग में जोर और भाग आजमाएगा 
सो सुनार कि एक लुहार कि एक दी वोह भी खायेगा 

लीग के पटेलों पवारों के वफादार को रस नही आएगा
हिल जायेगा देश पूरा थरूर तो थर्रा ही जायेगा 

थरूर गया थर्रा के बड़ी बड़ी पावरों को
पटेलो को मनोहओं को शुक्लों को मलयों को 

देखो ये पैसा लीग कया रंग लाती है
कितनो को गद्दी से उतारती और चढ़ावा चढ़ाती है 

ऐसी लीग से बचना यारों
अगर मारीशस में नही बसना प्यारों

Sunday, April 18, 2010

बगावत -अहसास ए मोहब्बत

हाल ए दिल तुम तो सुना गये
इकरार ए जुर्म अपना दर्ज करा गये
महफ़िल तुम्हारे चिराग ए हुश्न से थी रोशन
बेजार थे कसीदे पढ़ रहे थे हम तुम्हे याद कर कर
तुम चिलमन में छिपे रहे हम यारों में घिरे रहे
तुम क्या समझे हमे इल्म नही
हम तो अपनी तड़प नगमों में पिरोते चले गये
शमा में तुम्हारा अक्श देखते दास्ताँ ए मोहब्बत सुनाते चले गये
आँखें कैसे बगावत करेंगी हमसे हे बेवफा तुम जल्वाफ्रोज़ ही ना हुई
बगावत भी अहसास ए मोहब्बत ही तो है हम तो कितनी बार इसे सहलाते गये

मैंने कब दर्द के ज़ख्मों से शीकायत की है
हाँ मेरा जुर्म है के मैंने मुहब्बत की है
आज फिर देखा है उससे महफ़िल मैं पत्थर बन कर
मैं ने आंखों से नहीं दिलसे बगावत की है
उस को भूल जाने की गलती भी कर नहीं सकती
टूट कर की है तो,सिर्फ मुहब्बत की है

Thursday, April 15, 2010

एक वक्त

किसी बहिन बेटी माँ की आबरू पर जान निसार करने का मादा
किसी को वचन देकर जान देकर भी पूरा करने का वादा
धरती, गौ माँ के लिए प्रान न्योछावर करने का जज्बा
अगर देवी प्रगट ना हो तो शीश चढाने की इच्छा

याद करें उन पृथ्वीराज, शिवाजी गुरुतेगबहादुर,छ्त्रसालों को
कैसे भूल जाएँ आज़ादी की जलती
लक्ष्मी, तांतिया, तिलक, गोखले लालाजी
जैसी मशालों को
वन्दे मातरम के नारे पर
गाँधी के इशारे पर
सुभाष के पुकारे पर
भगत के चिंघाड़े पर
खून खौल जाता था
हर औरत का जेवर उत्तर जाता था
दिल दिवाना- और दिमाग सब भूल जाता था

उन आज़ादी के दिवानो
देश की अस्मत के परवानो का खून ही क्या
पूरा बदन खोल जाता था
बदन ही नहीं पूरा
चमन ही डोल जाता था

यारों -आज भी एक वक्त है
रोटी कपडा और मकान फक्त है

हम दो और हमारे दो के नारे पर
ना बहिन
ना भाई,
ना बाप
ना माई
ना पड़ोस
ना नाती
ना यार
ना खुदाई
सिर्फ खुद और लुगाई

बाकी जज्बात जब्त हैं
किसे देशप्रेम, धर्म परोपकार से इश्क है

खून जुर्म होते देख भी खौलता नही
मुख अस्मतें लुटते देख भी बोलता नही
हाथ दान को उठता नही
पैर देव दर्शन को बढ़ता नहीं
क्योंकी सफेदपोश सोच के उठता, करता,बोलता, है
अपनी नोकरी, अपनी छोकरी अपनी टोकरी को बचाने को
दुसरे को बर्बाद करता,
अपनों से किनारा करता
ना जाने किस किस के पैर पड़ता है
ऐसा सफ़ेदपोश आज हर गलीकूंचे में डोलता-मिलता-दिखता है

Sunday, April 11, 2010

यादे

दर्द ए दिल इसका क्या कहना
कितने जख्म यारों ने दिए क्या गिनना
सिर्फ पुराने तजुर्बे देते हैं नसीहत
इस लिए पड़ती हैं यादे संजोना

हर वक्त नही मिलते तुमसे वफादार
यह यादें करती हैं वफा,जब जख्मी हो सीना
जख्म भी धरोहर हैं उन जालिम की
जब मिलें तो सुनादेंगे उन्हें दास्ताँ ए हसीना

Friday, April 9, 2010

कर्म का मर्म

जैसा करेगा
वैसा भरेगा
सोएगा तो खोएगा
जागेगा तो पायेगा
कर्म करेगा फल पायेगा
प्यार करेगा प्यार ही पायेगा
दुनिया छोटी हो गयी
हिम्मत कर पार उतर जायेगा
कल करने को टालेगा
फ़िर कैसे पा लेगा
साथ में तेरे बहुत कुछ आया था
जाते बहुत साथ बांधेगा
यह मानव जनम भाग्य से पाया
प्रभु भजन परोपकार से इसे सफल बना लेगा

Wednesday, April 7, 2010

लाल झंडा लाल निसान

लाल हाथ लाल खून से रंगे
पुलिस का हो चाहे जनता हत्थे चढ़े

आज ७६ वर्ष में सेकड़ों मरे
देश के कोने कोने में कितने इनके हत्थे चढ़े ?

हिटलर भी उनके हाथ चढ़ गया`
१९६२ में चाचा नेहरु को डस गया

बंगाल की तरक्की वोह खा गया
देखो कितनी तेजी से आसमा पर छा गया

कभी इंदिरा कभी अटल कभी प्रचंड दहल
बंगाल से शुरू केरल पर रहा टहल

देश की आज़ादी में देशद्रोह की मीसाल
देश की तरक्की का विनाश और काल

नक्सल,फारवर्ड, वाम, माओवादी मार्किस्ट आदि
सभी अंदर से एक,दिखते अलग जैसे खांसी बुखार मियादी

प्रेम की भाषा दलाई पुकारते रह गये
हिंदी चीनी भाई भाई सुनाते नेहरु चले गये

इनका तो बस एक ही इलाज़ है
फौज की तैनाती और इनका पूर्ण विनाश है

सरकार में इच्छाशक्ति नही जनता में एका नही
वोटों की राजनीती इनको मरने देती नही

आज हमे ही आगे आना होगा
दे हथियार आदिवासी को इनसे टकराना होगा

जिनकी पैरवी का दावा यह करते है उन्हें इनसे बचाना होगा
वोह जग गये तो यह भाग गए इनको बतलाना होगा


Sunday, April 4, 2010

कब करेंगे प्यार


जिन्दगी उसकी जिसका यार
आज नहीं तो कब करेंगे प्यार
जैसे आज नगद कल उधर
प्यार के बिना जिन्दगी बैकार


बिल्कुल ठीक कहा मेरे यार
मारवाडी हम, देते नकद, करते नही उधार
बाहर झांक के देखा तो बिक रहा था प्यार
हम भी आज करेंगे तुमसे प्यार का इकरार
क्योंकी हम प्यार के मसयिया जीन्दगी भर बांटते प्यार

तमाम उम्र गुज़ारी फकीरी में कि खुदा मिलेगा,
जब मिला खुदा तो पूछते हैं कि तू शै क्या है.

फ़साना`ए जीन्दगी येही तो करता है
खुदा सामने तो मासुक की इबादत करता है
फकीरी मुयस्सर हुयी थी किसी की तड़प और duri me
जब मुलाकात हो गयी जान ए तमन्ना से
तो खुदा से उसका नाम पूछता है


Saturday, April 3, 2010

अभिशापित श्रापित जीन्दगी


गरीबी एक अभिशाप
जीन्दगी का सब से बड़ा संताप

बाप बड़ा ना भैया
सबसे बड़ा रूपया
पैसे की छनक पर गौरी की मुस्कान न्योछावर
दौलत की धमक पर झुकते करते सिजदा सर झुका कर

एक तर्फफ़ रईस का कुत्ता भी गद्दों पर सोता है
एक तरफ मज़दूर का बच्चा स्तनपान को भी रोता है

नहीं उतरता दूध उस गरीब अबला की छाती से
नहीं खायी रोटी तीन दिन बीत गए बिना दिया बाती के

यह अभिशापित श्रापित जीन्दगी

कल सुबह होगी नयी फसल आएगी
इस आशा में इस निर्धन माँ की रात बीत जाएगी

नयी सुबह तो दरवाजे पर साहूकार खड़ा होगा
घर का सदस्य बैल बा बा कर रहा होगा

साहुकार तो रस्सा खोल लेगया
खेती का अब क्या होगा

यह कैसी अभिशापित श्रापित जीन्दगी


कैसी गुलामी कैसा शोषण
दो रोटी के वास्ते बिक गया यह रमणी का गोर तन

कैसा मौन कैसा बोल, गरीबी के तराजू में तुल गया मन
धिक्कारते पुर्वजन्मो के पापों को इस श्रापित अभिशापित दिन

ऐसी है करोड़ों भारतियों की जीन्दगी ......................

बेक़सूर बारिश

बारिश बिचारी का क्या कसूर
वोह तो है हमेशा मजबूर

उसका तो काम ही है बरसना भिगोना
कहीं सिर्फ पल्लू कहीं पूरा सराबोर

मिटटी भी बेचारी क्या करे
उस ने तो बारीश की आहट पाते ही होता है महकना

बेदर्द यह आँखे तरसती दीदार को किसी को
कभी कभी काम कर जाती हैं बारीश सा बरसाना

बारिश तो माशूक के सामने रख लेती है इज्ज़त
आंसुओं को ढक बूंदोंमें समेट लेती हें

कर मत नफरत तू बारिश से औ निशीत
यह तो आशिको की कल्पना, राहत और सहेली है

Thursday, April 1, 2010

मानव -प्रभु का वरदान

मानव धर्म में हमे सब कुछ लेना
चाँद देखना सूरज बनना और सीतारों से बाते करना
अपने पराये की बात नहीं पुरे विश्व को दिल में रखना

स्वार्थ परमार्थ की लम्बी कहानी
दोनो के बीच में बड़ी छोटी सी गिनती जानी

माँ को बेटे से बेटे को माँ से स्वार्थ की माँ होती क्या कोई सीमा होती है
लेकिन माँ के जीन्दा रहने तक और मरने के बाद भी सदगति बेटे से ही होती है

सन्यासी साधू को चेले से क्या आस होती है
फिरभी गुरु परम्परा गुरु दीवस गुरु दक्षिणा होती है

मानव धर्म तो स्वार्थ का नाम है
धर्म करता पुन्य कमाता उसे कहते इंसान हैं

राम रहीम रविदास कबीर तुलसी सूर रसखान
बखान गए महिमा नर नारायण की और परिभाषा-ए-शेतान
इसलिए इंसान पहीले फीर सार्थक जीवन यह प्रभु का वरदान