Wednesday, April 7, 2010

लाल झंडा लाल निसान

लाल हाथ लाल खून से रंगे
पुलिस का हो चाहे जनता हत्थे चढ़े

आज ७६ वर्ष में सेकड़ों मरे
देश के कोने कोने में कितने इनके हत्थे चढ़े ?

हिटलर भी उनके हाथ चढ़ गया`
१९६२ में चाचा नेहरु को डस गया

बंगाल की तरक्की वोह खा गया
देखो कितनी तेजी से आसमा पर छा गया

कभी इंदिरा कभी अटल कभी प्रचंड दहल
बंगाल से शुरू केरल पर रहा टहल

देश की आज़ादी में देशद्रोह की मीसाल
देश की तरक्की का विनाश और काल

नक्सल,फारवर्ड, वाम, माओवादी मार्किस्ट आदि
सभी अंदर से एक,दिखते अलग जैसे खांसी बुखार मियादी

प्रेम की भाषा दलाई पुकारते रह गये
हिंदी चीनी भाई भाई सुनाते नेहरु चले गये

इनका तो बस एक ही इलाज़ है
फौज की तैनाती और इनका पूर्ण विनाश है

सरकार में इच्छाशक्ति नही जनता में एका नही
वोटों की राजनीती इनको मरने देती नही

आज हमे ही आगे आना होगा
दे हथियार आदिवासी को इनसे टकराना होगा

जिनकी पैरवी का दावा यह करते है उन्हें इनसे बचाना होगा
वोह जग गये तो यह भाग गए इनको बतलाना होगा


Sunday, April 4, 2010

कब करेंगे प्यार


जिन्दगी उसकी जिसका यार
आज नहीं तो कब करेंगे प्यार
जैसे आज नगद कल उधर
प्यार के बिना जिन्दगी बैकार


बिल्कुल ठीक कहा मेरे यार
मारवाडी हम, देते नकद, करते नही उधार
बाहर झांक के देखा तो बिक रहा था प्यार
हम भी आज करेंगे तुमसे प्यार का इकरार
क्योंकी हम प्यार के मसयिया जीन्दगी भर बांटते प्यार

तमाम उम्र गुज़ारी फकीरी में कि खुदा मिलेगा,
जब मिला खुदा तो पूछते हैं कि तू शै क्या है.

फ़साना`ए जीन्दगी येही तो करता है
खुदा सामने तो मासुक की इबादत करता है
फकीरी मुयस्सर हुयी थी किसी की तड़प और duri me
जब मुलाकात हो गयी जान ए तमन्ना से
तो खुदा से उसका नाम पूछता है


Saturday, April 3, 2010

अभिशापित श्रापित जीन्दगी


गरीबी एक अभिशाप
जीन्दगी का सब से बड़ा संताप

बाप बड़ा ना भैया
सबसे बड़ा रूपया
पैसे की छनक पर गौरी की मुस्कान न्योछावर
दौलत की धमक पर झुकते करते सिजदा सर झुका कर

एक तर्फफ़ रईस का कुत्ता भी गद्दों पर सोता है
एक तरफ मज़दूर का बच्चा स्तनपान को भी रोता है

नहीं उतरता दूध उस गरीब अबला की छाती से
नहीं खायी रोटी तीन दिन बीत गए बिना दिया बाती के

यह अभिशापित श्रापित जीन्दगी

कल सुबह होगी नयी फसल आएगी
इस आशा में इस निर्धन माँ की रात बीत जाएगी

नयी सुबह तो दरवाजे पर साहूकार खड़ा होगा
घर का सदस्य बैल बा बा कर रहा होगा

साहुकार तो रस्सा खोल लेगया
खेती का अब क्या होगा

यह कैसी अभिशापित श्रापित जीन्दगी


कैसी गुलामी कैसा शोषण
दो रोटी के वास्ते बिक गया यह रमणी का गोर तन

कैसा मौन कैसा बोल, गरीबी के तराजू में तुल गया मन
धिक्कारते पुर्वजन्मो के पापों को इस श्रापित अभिशापित दिन

ऐसी है करोड़ों भारतियों की जीन्दगी ......................

बेक़सूर बारिश

बारिश बिचारी का क्या कसूर
वोह तो है हमेशा मजबूर

उसका तो काम ही है बरसना भिगोना
कहीं सिर्फ पल्लू कहीं पूरा सराबोर

मिटटी भी बेचारी क्या करे
उस ने तो बारीश की आहट पाते ही होता है महकना

बेदर्द यह आँखे तरसती दीदार को किसी को
कभी कभी काम कर जाती हैं बारीश सा बरसाना

बारिश तो माशूक के सामने रख लेती है इज्ज़त
आंसुओं को ढक बूंदोंमें समेट लेती हें

कर मत नफरत तू बारिश से औ निशीत
यह तो आशिको की कल्पना, राहत और सहेली है

Thursday, April 1, 2010

मानव -प्रभु का वरदान

मानव धर्म में हमे सब कुछ लेना
चाँद देखना सूरज बनना और सीतारों से बाते करना
अपने पराये की बात नहीं पुरे विश्व को दिल में रखना

स्वार्थ परमार्थ की लम्बी कहानी
दोनो के बीच में बड़ी छोटी सी गिनती जानी

माँ को बेटे से बेटे को माँ से स्वार्थ की माँ होती क्या कोई सीमा होती है
लेकिन माँ के जीन्दा रहने तक और मरने के बाद भी सदगति बेटे से ही होती है

सन्यासी साधू को चेले से क्या आस होती है
फिरभी गुरु परम्परा गुरु दीवस गुरु दक्षिणा होती है

मानव धर्म तो स्वार्थ का नाम है
धर्म करता पुन्य कमाता उसे कहते इंसान हैं

राम रहीम रविदास कबीर तुलसी सूर रसखान
बखान गए महिमा नर नारायण की और परिभाषा-ए-शेतान
इसलिए इंसान पहीले फीर सार्थक जीवन यह प्रभु का वरदान

Wednesday, March 31, 2010

मन की दौड़ .....................

पुरे एक माह के पश्चात्
फीर वापिस बच्चों के पास

दिल्ली मथुरा की चिलचिलाती गर्मी से निजात
और मैसूर की मधुर वादी में पुनह वास

दिल के कीतने टुकड़े होते हैं
एक उस के एक तुम्हारे करीब होते हैं

मथुरा में राधावल्लभ बिहारी जी द्वारकाधीश के दर्शन
गुरुशरनानंद जी जैसे निश्चल आत्माओं में विचरण

जीवन का एक विकट, अटल सफल परिक्षण
जीसे सोच सोच प्रफुल्लित होता यह मन

लेकिन घर से दूरनन्हे मुन्ने बच्चों की मुश्कान
अपनी छत, गृहलक्ष्मी द्वारा चाय के प्याले पर उतरती थकान

पिछले २० वर्षो के मित्रो साथिओं की खट्टी मीठी यादें फील्म सी दिखती जाती हैं
जीवन के इस पड़ाव में पुकारती बुलाती पुन :पुन: विचलित करती जाती हैं

यह मन का पवनवेग का एरावत खीच लाता है
दिलासे देता और बहाने बनाता घर पहुँच ही जाता है

हर बार लगती है यह अंतिम मथुरा यात्रा
लेकिन मानव धर्म,
मेरा करम
गोरक्षा में बढ़ते कदम
संकल्पों को पूरा करने का भरम
प्रेरित करता उठाता यह निश्छल ठिठुरा तन
और बढ़ चलते है कदम
कर्मस्थली की और दाब के निष्ठुर मन



Monday, March 29, 2010

भविष्य स्वप्न

भविष्य स्वप्न भूत मार्गदर्शक वर्तमान वास्तविकता
जो भूत में विचरता वोह इंसान स्वप्नों में जीता

आत्मविश्वास की कमी याने भविष्य की क्षति
प्रभु में विश्वाश भूत की हार की याद सफलता को चुनती

मनुष्य भगवान तो नही यहाँ तो उसे भी दायरों में जीना पड़ा
शंघर्ष उसने किया आपदाओं को जीता और भगवान् बना

संघर्ष तेरी नियति संघर्ष कर संघर्ष कर कामयाबी सामने खड़ी
तू पस्त हुआ, संघर्ष से मुह मोड़ा, फीर तेरी किस को पड़ी

दिल ए दर्द ए नादाँ का क्या कहना

तेरा दर्द चाट गया मेरा बदन
कुछ ज़िंदगी ने पी लिया अन्दर तलक मुझे
..........
दिल ए दर्द ए नादाँ का क्या कहना
कुछ पी गया मेरा दर्द और तेरा सीना

जींदगी का सफ़र और उस के यह खुबसूरत पड़ाव
कुछ पल हमारे साथ कुछ पल अपने साथ बिताओ

यादों के झरोखे से जब झांकोगे
हमारी खुशबु आएगी हमे करीब पाओ

वक्त कि हर् शह गुलाम


वक्त कि हर् शह गुलाम, हर कोयी इसे करता सलाम
मस्ती मे भुल जाता अपनो को, करता दुजो का जीना हराम

वक्त का मारा ठोकर खाता, मिलता नही उसे आराम
दुजे का किया वो भुगतता, दोषी सारा मुक्कदर और राम

नानक दुखिया सब सन्सार, दुख कट्ते मिल जुल हरबार
जब तुम रोते कोयी साथ ना रोता, ह्न्सते पुर सन्सार

गरीब की जौरु सब की भाभी, रइस का कुत्ता बिस्कुट खाता
इस दुनिया की रीत येहि, मरने वाले के साथ कोयी नही जाता

दिन के बाद मे रात अगर आती, तो रात के बाद दिन भी आता
फिर येह इन्सान अपने सुख के पल क्यो नही बाट बिताता

कह गये ग्यानि सारे,दुख बाट्ने वाले को सुख हि सुख मिल
ता
कर परवाह होगी परवाह ,येह सत्य मानव क्यो नही अपनाता

Saturday, March 27, 2010

माँ बाप मजधार में

पढ़ लिखकर बाजार में लेते फिरता सीख
घर चलाता अनपढ़, ढोता माल बोझा खीच

मांग काढ जुल्फ बना ढूंढे नोकरी को
घर पर गांठे रोब, तोड़े रोटियां,पाठ पढ़ावे सबको

नोकरी अगर मिल जाये तो भी किस काम को
गाँव छोड़ शहर को भागे ठोकर मारे माँ बाप को

कबीरा काम का ना काज का पढ़ा लिखा
इसको को तो चाहिए मेज कुर्सी चाहे किस्तों पर लेआ

नकल मार के पास हुआ और रिश्वत दे के नोकर
चमचा बन के तरक्की पाई मेमसाब का बन कर

चांस लग गया तो विदेश गया दुल्हनिया को छोड़ कर
गिट पिट कर मेम पटाई भुला अपना गाँव घर

कबीरा इस संसार में तू किस पर भरोसा करता सोच सोच कर
यह भी पढ़ लिखने की रीत है बढ़िया तू तो बुनकरका बुनकर

Tuesday, March 23, 2010

परमारथ का फिलसफा

बहुत हो गया किसी को देख कर दिल का धडकना
पीछे मुड कर देखो क्या कहो दिया और कितना

अभी कुछ बिछड़ा नही कुछ खोया नहीं
जीन्दगी का एक पल भी अगर स्वाति की बूंद तो मोती की कमी नहीं

सफलता कामयाबी हर जीव के लिए अलग होती है
किसी को एक बोतल मिल जाये उसकी जीन्दगी धन्य होती है

कोई एक मधुर मुस्कान पर जीवन न्योछावर करता है
कोई दुसरे की तरक्की देख दुखी और हार पर खुश होता है

गाँधी अफ्रीका में पिटके भी नई उछई पा गये
अहिंसा को हिंसा से लड़ा देश आज़ाद करा गये

देश याद करेगा जे.पी, लोहिया को जिन्होंने देश को दिशा दी
भूल नही सकते दीनदयाल, श्यामाप्रशाद को जिन्होंने एकात्ममानववाद की रचना की
भूलेंगे नहीं शेरपा को जिसने हिमालय विजय किया
धरा का सीना चीरता किसान किसीसे कम नही जो देश का पेट भर रहा

गुरु विनोद बिस्सा कम नही जो हमे सिक्षा दे रहे
रोज नए संवाद पैदा कर हमे आगे बढ़ा रहे

अंत में हर इंसान में देव दानव निवास करता है
हर औरत में माँ,बेटी,बहिन,प्रयसी,सीता , केकई का रूप होता है

मर्यादापुरषोतम राम ने बालीको बेकसूर स्वार्थवस मारा था
धर्मराज युधिस्तर ने भी अस्वथामा हथो - नरो व कुंजरा गुरुवध को उचारा था

क्या एक भी इंच धरती ऐसी है जहाँ कोई मरा नही
क्या ऐसा एक भी इंसान है जिसने चोरी करी नही

इस लिए जहाँ भी मौका पाओ
परमारथ का लुत्फ़ उठाओ -लुत्फ़ उठाओ ........................
--
डॉ. श्रीकृष्ण मितल

Sunday, March 21, 2010

अभिलाषा

बहुत मैं ने मंदिर धोके.
पीर पैगम्बर ओझे देखे

तीरथ नदिओं में स्नान किया,
अभिलाषा बतलाई और सवाल किया

मुझे अजर कर दो अमर कर दो
सब ने बतलाया`हाथ जोड़ के दो


पूरी होगी अभिलाषा, मार्ग बताया यह वरदान दिया
आने वाली नस्लें याद करें की इस धरा पर कोई हुआ

तुम्हे अमर होने की अभिलाषा तो सिर्फ एक बहाना है
मृत्यू अटल है मिलनी सबको, जिसको तो आना ही आना है

पूरी करनी अभिलाषा तो ,दीन दुखी का दर्द दूर भागना है
छोड़ मजहबपरस्ती- कर सेवा- जिससे भगवान को पाना है

जन्नत को नर्क बनाने वालों पर दावानल बन छा जाना है
धधको अग्नि दावानल जैसे तुम्हे कुछ कर के दिखाना है

जिनका दिल साफ़ नही और अग्नि सा जो जल धधक रहे
पहिचान उन देश द्रोहिओं को तुमने उन्हे अग्निकुण्ड में डुबाना है

धरा पर संघर्ष करवाने वालों को नंगा कर प्रेमपथ उनसे ही बनवाना है
आज धर्म के ठेकेदारों ने कहर ढाया उन्हें राह पर लाना है

तुम तो अमर हो जाओगे पर उन्हें इंसान बनाना है
बढे चलो मुड के ना देखो तुम्हे वीर गति पाना है

पूरा देश तुझे निहारे तू तो अमर होगया
यह मिटटी का चोला रहे ना रहे तेरा नाम तो सभी ने माना है

राम रहीम गोतम ना रहे पर क्या उनकी मौत हो गयी?
कर्म करे तू वैसे, फ़िर, तेरी अमर होने की अभिलाषा तो पूरी होगयी

डॉ. श्रीकृष्ण मित्तल

Saturday, March 20, 2010

प्राणी धर्म

प्राणी धर्म
वोह मुख क्या पाक जो सिर्फ राम रहीम का जप करे
या वोह हाथ जो मैल उठाता,लेकिन दूसरों की मदद करे .

कहते हैं गिलहेरी को राम ने उठाया था
उसे बड़े बड़े तपसियों से भी ऊँचा बताया था

मरा मरा जप के रत्नाकर बाल्मीकि बन गये
प्रकांडपंडित तिर्कालदर्शी त्रिलोकविजेता एक दिन लद गये

सिकंदर खाली हाथ आया था खाली हाथ ही गया
लेकिन हार कर भी पोरस अपना नाम अमर कर गया

क्या हिंदु क्या मुस्लिम क्या करुं धर्मो की बात
धर्म तो सारे प्रेम सिखाते पर हम फैलाये उत्पाद.

मानव, मानव के काम न आये ये तो नादानी है
बेअदबी,
इर्षा
मक्कारी,
नमकहरामी
गरूर,
शरूर,
बेइमानी,
बदकारी
का जीना,दुश्वारी और बेमानी है

इस मानव जीवन की बस एक कहानी है
कर भला हो भला,जो मान ले,वो ही प्राणी है
--
डॉ. श्रीकृष्ण मितल
.

Thursday, March 4, 2010

होली के हुल्लड

दिल तुम्हारा रहे जवान
और खेलो होली राधाओं से
चले शेर और मीठी जुबान
हम तुम्हारे आशिक
होली पर करते तुम्हे प्रणाम
आया जाओ मैसूर खेलेगे होली
भर के बाल्टी और पिचकारी बेजुबान
लाना भर के झोला रंग गुलाल मिठाई
मिलेगी भोजाई हमारे से .
भांग के नशे में, रंगों के अँधेरे में
कोन किसे पहिचानेगा
कोन किसे पुकारे गा
जो सामने आगयी उसे ही रंग डालेगा
भौजी किसे बीबी किसे,
आज तो हर गोपी भोजाई नज़र आती है
गली में निकलो तो सही
रंग की दुकान पर
हुल्लाडों की भीड़ नज़र आती है
चला रहे नैनों के बाण -
हाथ में पिचकारी तान
पुरे साल की जवानी आज ही तो रंग लाती है
छुपे के तान फिर देख कैसे गोपी बिना रंगे निकल जाती है


Tuesday, October 6, 2009

करवा चौथ की महीमा

देवी लक्ष्मी की सब पूजा करते हैं
इसे देख लक्ष्मी वाहन उल्लू जलते हें ।।

एक दि लक्ष्मी बिना वाहन के हो गयी
उल्लू महाराज रूस् गये माता घर में बैठी रह गयी
माँ ने वजह पूछी और खिलखिला  कर हंस पडी

माँ तेरी पूजा ३६५ दि २४ घंटे होती है
तुझे वहां पहुचाने में मेरी बुरी हालात होती है

माँ समझ गयी और दे दिया वरदान
साल में एक दि तेरी भी होगी पूजा और मान

सुहागिन  तेरे नाम का व्रत रखेंगी
चरण छुएंगी और तुझे पूजे ध्यायेंगी

वोह शुभ दि दिपावली से पहिले आएगा
करवा चौथ के नाम से मनाया जाएगा ॥
साथिओं इस दि हर घर में सुबह से रात तक पूजा का माहोल होता है
हर पत्ति पूजा और ध्याया जाता है

हर उल्लू की ये ही कहानी है
पुरे साल करता इंतज़ार कि करवाचौथ कब आनी है

महिमाकरवा चौथ की हर उल्लू ने जानी है
गृह लक्ष्मी की पूजा ३६४ दि और उल्लू की करवा चौथ पर हो जानी है

जय लक्ष्मी माता 

Tuesday, April 7, 2009

पत्थर दिल

पत्थर समजकर आज जो ठोकर लगा गए
समजकर कल वो शायद सर जुकायेगे।।

यह गलतफहमी क्यों हो गयी
की वोह सिर को झुकायेंगे ।

जो माँ बाप को पूछते नहीं
पत्थर कहाँ पूजने जायेंगे ।

ठोकर में पत्थर आया..................
कोई बात नहीं........

इंट ३ रूपये की आती है
नाली में पत्थर लगा कर पैसा बचाएंगे ॥

बड़ी कमजोर निकली तुम्हारी यारी रब्बा


"भूले है रफ्ता रफ्ता उन्हें मुद्दतों में हमकिश्तों में खुदखुशी का मज़ा हमसे पूछिये !

बड़ी कमजोर निकली तुम्हारी यारी रब्बा
दो दिन नजरों से दूर हुए तो खुदकुशी की धमकी दे दी
कहीं हमारा जनाजा निकल जाता तो शायद .............
हुजुर तो जन्नत नशीं होती
अरे हम ऐसे वैसे आशिक नही
जो भूलने दे अपने रकीब को
अपना जलवा दिखाने को कभी कभी पर्दा भी डलता है
आज हमारा जलवा पूरा हिंद देख और सरहा रहा है
कुछ काम का बढ़ना, कुछ कामयाबी का और आगे बढना
कर गया मजबूर,और महरूम इस नाचिच को,
दोस्तों से दुआ सलाम करना
दिल चीर कर दिखा सकते नहीं वर्ना
तुम्हे अचरज होता
अरे वहां तुम्हारे अलावा और किसी का अक्श भी कैसे होता

वीरों की परिभाषा

वीरों की जरूरत
आज भाटों की नही वीरों की जरुरत है
जो भिड सके दुश्मनों से राष्ट्र के खातिर
खून खोलता हो जिसका अत्याचार देख
ऐसे ही चाहिए नोजवान जिसमे हो वेग.
..........
वीरों की जरूरत तो आदिकाल से चली आई है।
आल्हा उदल वीर शिवा छत्रसाल से यह धरा सजाई है॥

खून हो तो खोलेगा यारों
यहाँ तो डालडा और बिसलरी पिलवायी है॥

जो बोले हाथ कटवा दूंगा उसे रासुका,
जिसके साले ............
बीबी बेलगाम चले ............
और खुद बुलडोजर चलवाए .............
यह २ /३ की राजनीति
देश के नवजवानों पर छाई है ।।

बगल में तालिबान दहाड़ रहा...........
२६/११ हो चूका ..........
अब शायद मोदी अडवाणी जैसों की बारी आई है॥

एक नोजवान ने सत्य बोलने का साहस किया।
माया लालू मुलायम प्रियंका जैसो की बन आई है॥

गुरु कुर्बानी किसी मकसद से हो तो रंग लाती है।
नहीं तो खुदकुशी पर देश का कानून हरजाई है॥

इजहारे ऐ महोब्बत

सुबह शाम हमें याद आते क्यों हो,
सपनो में भी आके हमे रुलाते क्यों हो,
मेरा दिल तो सदा तुम्हारा तलबगार रहा,
फिर अभी इससे अक्सर तड़पाते क्यों हो,
ज़िन्दगी पहेले ही खड़ी है दोराहे पर,
इस पर भी तुम हमे भटकाते क्यों हो,
इश्क की इन्तहा बन गया है अब ये दर्द,
झूठे वादों से हमे बहलाते क्यों हो!!

किसी बेदर्द बहैया ने सवाल पूंछा हमसे
हमने कहा अक्स ए आईना देख
कितने दिलों को गुलाब की तरह कुचला तुने
कितने रकीबों इंनायत की दिखा कर तुने
हमने जब इज़हार ए मोहब्बत किया था
तुमसेतुमने दिखाई थी सड़कें और दुनियादारी की मुसीबतें
हम तो आज भी खडे इंतज़ार करते हैं अपने इश्क का
कब मिलेगी दो लह्मो की फुर्सत हमारी दिलरुबा को हमारे लिए
कभी आवाज देकर देखना जालिम
हम ही मिलेंगे इंतज़ार ए मेहरुबा के
कब्र के किनारे भी खडे हुए

Monday, February 9, 2009

परिवार

परिवार से होती है पहिचान
परिवार से बढती है शान ॥

परिवार करता है होसले बुलंद
परिवार ही ख्याल रखता जब तू तंग॥

परिवार न होता तो महाभारत ना होती
परिवार ने बताई भरत के त्याग की चोटी॥

परिवार की महिमा देवताओं ने गयी
शिव परिवार के दर्शन बहुत शुभ होते हैं भाई॥

जब बाबा की गोद में पोता आता है
खेलता कूदता और घोड़ा बनाता है॥

उस समय बाबा की जीना हो जाता है सार्थक
अगर परिवार न हो तो सभी निरर्थक ॥

आप और हम भी एक परिवार ही तो है
जिस के राजा रानी हम और आप है॥


खूब समझाई है परिवार की महिमा....
लेकिन एक बात है आपने भी छुपाई ..
परिवार हीं है जो सीमित कर देता है इन्सान को..
नहीं लड़ पाता ज़माने के जुल्मों के खिलाफ ..
डरता है क्या होगा उसके बाद...
समझौते करवाता है परिवार..
फिर भी सबको भाता है परिवार...
सुखी रहे आपका परिवार


सुमन ..................................

दिलज़लों का हर जगह येही हाल होता है
परिवार के अंदर या बाहर उनका तो मुह लाल होता है

जो परिवार में रह नहीं सकते
वोह समाज में भी शायद खप नहीं सकते

हर सर्दी के बाद गर्मी आती है
हर रात के साथ दिन जुडा होता है॥

हर फूल के साथ कांटे होते है
हर अधिकार के साथ फर्ज भी अदा करने होते है

कुछ लोग सिर्फ अधिकार जानते हैं
जवाबदारी से मुह चुरा के भागते हैं

ऐसे लोग अपने माँ बाप को भी धत्ता बता देते हैं
मजे लेने के लिए पैदा किया कौनसा अहसान किया सुना देते है

हमने यूरोप भी देखा है
जहाँ परिवारों का टोटा है

उनका हाल भी हम जानते हैं
जाने कितने ओल्डएज होम उनकी छाती पे गडे हैं

इसलिए फिर कहता हूँ सुनो खोल के कान
रहना भाईओं के बीच चाहे जंगल हो या मकान

Thursday, February 5, 2009

नेता की महिमा

अफसर नेता दोनों खडे काके लागु पाए
बलिहारी नेता अपनों जो अफसर से सलाम कराए

नेता बैठा पेड़ पर रहा सबकी हरकत देख
चमचों पर करपा करे खागया, देश और खेत

अफसर गुंडे और नेता हैं आज के ब्रह्मा विष्णु महेश
पूरा देश कब्जे में इस त्रिमूर्ति के बाकी सब अवशेष

ब्रह्मा पूजे विष्णु को विष्णु पूजे महेश को महेश उसे दिल में धारे
ब्रह्मा सबका रचियेता सब एक पर दिखते सारे नियारे

इनकी लाली देखन मैं गया जित देखूं उत लाल
देखत देखत खा गये देश विदेश में गया माल

गिरगिट ने शिकायत करी क्यों करते मुझे बदनाम
रंग पलटने दल पलटने और आँख बदलने में यह मुझसे महान

रहिमन नेता की झोपडी होत बहुत विशाल
चमचे भी बना गये कार, दुकान महाल

नेता से डर कर रहियो कभी न निभावें प्रीत
सरकारी दामाद यह इनकी माल पचाने की रीत

पढ़ लिख कर तू कया करेगा बन जा किसी का चमचा
नेता बन, माल डकार, होगा तेरे पास रुतबा, नाम और पैसा

जीत गया तो मंत्री और हार गया तो निगमों का अध्यक्ष
पार्टी में रुतबा तेरा, थाने में शब्द तेरे, जनता को तू भक्ष

जेल गया तो कया हुआ कल अख़बार में देख
नेता बनने का रस्ता होत जात जेल के खेत

Monday, January 26, 2009

गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ

यह आजादी का सुनहरा गणतन्त्र
विश्व में बेमिसाल हमारा प्रजातंत्र ।

अब तजुर्बेकार हो गया यह तन्त्र
हमे फक्र है की हमारा है यह गणतन्त्र॥

याद आती है लिछिविओं की जिहोने विश्व को गणतन्त्र दिया
नमस्कार बाबा साहेब अम्बेडकर को जिन्होंने विश्व का सर्वोतम सविधान दिया ॥

75 सालों में इसमें सैकडो परिवर्तन हो गये
जैसे सोने की मूर्ति पर हीरे मोती टंग गये ॥

इसही सविधान से बिना खून के सत्ता की परिवर्तन है
बोलने, पूजा, व्यवसाय, आवागमन की पूर्ण स्वतन्त्रता है॥

सांसदों को,विधायकों को, नगर ग्रामसभाओं का चुनाव होता है
इसके सामने प्रधान मंत्री को भी सर झुकाना होता है ॥

उपर बैठे कह रहे होंगे गाँधी नेहरु तिलक गोखले
लाजपत भगत राजगुरु चंद्रशेखर सुभाष जो लड़े और चले ॥


हर वर्ष लगेंगे मेले बस शहीदों का येही मुकाम होगा
जब भी उनकी याद आएगी आँखे नम होंगी और जुबान पर नाम होगा ॥

तूफान से लाये थे आज़ादी के परवाने किस्ती निकाल के
इस गणतन्त्र को रखना मेरे साथियो संभाल के॥

दुश्मन आतंकी खडा है दरवाजे पर बंदूकें तान के
सम भारतमाता की खाते हैं रखेंगे हम इसको सम्भाल के ॥

आप को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ

Monday, January 5, 2009

एक और नयी सुबह का फूल ......................



बधाई नव वर्ष की और क्षमा करना मेरी भूल

कल सुबह भी देखा था खिलता मुस्कुराता फूल
हुयी शाम और ढल गया फूल

क्षण भंगुर यह दुनिया,
जानत सभी फिर भी गये भूल

पल की खबर नहीं, सामा १०० वर्ष का
प्यार को समय नही, झगडा कयामत का

फिर भी एक और नयी सुबह और उसका फूल

सोचता हूँ समय थमता नही
रात रूकती नही सुबह थमती नही

हर वर्ष फिर नव वर्ष की गूंज और हाथ में फूल

लेते भी, देते भी, दोस्त भी दुश्मन भी
राजा भी रंक भी, साधू भी संत भी
हिन्दू भी मुसलमा भी
सभी लगते इस नई सुबह का
खिलता मुस्कुराता चमन का फूल

फूल के साथ में कांटे जो दिखते नही
फिर भी दिल में दे जाते शूल

ऐसा ही कुछ हुआ गत वर्ष
जैसे बम्बई पर आतंकवादी हमला
शेएर बाज़ार का ४ लाख करोड़ पी जाना
पुरे विश्व का मंदी में घिर जाना
संसद में नोटों का लहराना
बेनजीर का हलाक ............और
श्रीमान १०% का सदर बन जाना
अर्र्रे ............दुनिया के थानेदार पर जूता चल जाना

किसी को फूल किसी को कांटे
किसी को शूल किसी को तोहफे
................एक और नयी सुबह .....और.....फूल

Thursday, November 27, 2008

धिक्कार


भारत के कर्णधारों को
देश के सुरक्षा के जिम्मेदारों को
धिक्कार धिक्कार धिक्कार

जो घर के रहने वालों पर भोंकते काटते हैं
बाहर के आतंकियों को देख दुम दबा कर भागते है
निर्दोषों की जानो को दाव पर लगा कर झूटी शान बखारते हैं
धिक्कार धिक्कार धिक्कार

उन देश के नेताओं को
जो सुभाष भगतसिंह आजाद का नाम बदनाम करते
पंचशील को पुकारते हर बार यह आखिरी है वादा करते
ऐसे भेडियों को
धिक्कार धिक्कार धिक्कार

कभी कारगिल तो कभी संसद
कभी काशी तो कभी दखन
कभी दिल्ली तो कभी बम्बई
देश की अस्मत को लुटाते
निर्दोषों की जान गवांते
ऐसे पाखंडियों देश द्रोहियों को
धिक्कार धिक्कार धिक्कार


सब्र का बाँध टूट गया है
देश आंसुओं डूब गया है
विदेशी ठठाका मार रहा है
ऐसे शिखंडी सरकार पर
धिक्कार धिक्कार धिक्कार

देश की सेना क्या सो रही है
गुप्तचर सेवा क्या सुप्त हो रही है
ATS क्या अब रो रही है
ऐसी सरकार को
धिक्कार धिक्कार धिक्कार

देश भक्तों और सेना गोरवों पर
कहर बदनामी बरपा कर
अफजल को फांसी दोगे तो काश्मीर जल जाएगा सुना कर
देश की आन बान शान लूटा रही है
ऐसी राजनीती को
धिक्कार धिक्कार धिक्कार


आज जरूरत है इंतकाम की
इन आतंक के सौदागरों के दिल में
भारत के बदले और इंतकाम की
एक के बदले चार की यानी पैनी तलवार की धार की
नहीं तो हमें नहीं स्वीकार


उठो
देशवासिओं ऐसे देश के दुश्मनों से देश को बचाओ
खुल के सामने आओ और इनको बोली गोली और मतों से सबक सिखाओ





Saturday, October 25, 2008

गुरु को संदेश


गुरुदेव का आशीर्वाद बडी मुद्दत बाद मिला
जैसे डूबते जहाज को सिंदबाद मिला

हम तरसते थे गुरु ज्ञान पाने को
अपने क ख ग सुनाने और मार खाने को

एक समय ऐसा आया
गुरु ने हमे दिल से दूर हटाया

हमे मालूम ना हुयी त्रुटी हमारी
क्यों गुरुदेव ने हमारी यादें बिसारी

महीने कई बीत गये
गुरु हमे भूल गये

आज दिवाली आई है
शायद गुरुमन में प्रीती पुनः आई है

धन्य हुआ जीवन हमारा आप का संदेश आने से
मन गयी दिवाली, छूटे पठाखे, पेट भर गया खाने से

अब अगर भुलाया तो हम भी आपके चेले हैं
फिर नही कहना, बेसुरे, नाकारा, अलबेले हैं

तुम हमे छोड़ दोगे हम 'यह' दुनिया छोड़ देंगे
गुरु ही नहीं तो हम मान किसे देंगे

दीपावली पर आपने नया विषय उठाया है
बिल्कुल ठीक फरमाया है

दीपावली का प्रकाश



दीपावली प्रकाश और दिलों के मिलने का त्यौहार .
दीपावली ख़ुशी और उमंग का त्यौहार

हर वर्ष हम गणपति लक्ष्मी मनाते हैं
रिद्दी सिद्दी, धन दौलत, सुख शांति मनाते हैं

राम का राजतिलक उत्सव सदियों से मनता आया है
आज फिर वही अवसर आया है

शुभ हो यह अवसर खुशीआं भरपूर पाओ
लक्ष्मी पूजन करो गणपति को रिझाओ

मित्तल परिवार की बधाई और शुभ कामना सुनो और बांटो
जो खुशीआं मिले उन्हें जरुरतमंदों में भी बाटों

Thursday, October 23, 2008

मानस शोर्य कामना

जिसने भी तुम्हारा नाम मानस रखा होगा
तुम्हारे नामकरण के बाद इतहास बन गया होगा

हम बचपन से सुनते हैं
खत्री बहुत सुंदर होते है

आज हम देख रहे है
सुंदर ही नही रचियक भी पा रहे हैं

इस उम्र में तुम्हारा यह हाल है
जल्द बडे हो जाओ खाली पडे हाल हैं

तुम्हे बहुत आगे जाना है
दुनिया को बहुत कुछ सुनाना है

आज स्कूल की पुस्तिका में स्थान मिलता है
कल विश्व प्रसारण में उच्च स्थान दिखता है

हर फिल्म में हीरो कवि और गायक होता है
सुना के अपनी कविता कविताओं को मोहता है

तुम्हारी भी उम्र आने वाली है
इस कला की जरूरत तुम्हे जल्दी ही पड़ने वाली है

अपने जैसी ही नायिका का वरन करना
जो तुम्हारी प्रेरणा बन सके ऐसी का चयन करना

कुछ वर्ष शादी के बाद अपने जैसा चिराग जलाना
उस भी मानस यानी मानसपुत्र खत्री बनाना

और क्या लिखें आज इतना काफी है
हमारा आशीर्वाद, आशीष, तुम्हारा साथी है

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रामचरित 'मानस'

तेरे प्यार की क्या तारीफ करूं कुछ कहते हुए मैं डरता हूँ
कहीं भूल से यूँ ना समझ लेना की मैं तुम से महोब्बत करता हूँ

सात समुन्द्र पार से मैं लेता हूँ तुम्हारी बलैयां
तुम अयोध्यावासी मैं तो केवल रामभक्त हूँ भैया

हम हैं दंडकारन्य लंका के पडोसी महिसासुर की नगरी के दक्षिणवासी
तुम पढ़ लिख राम बनाना आना इधर बन सन्यासी

सीता जैसी कोमलांगी तुम्हारे साथ हो और लक्ष्मण जैसा भाई
हनुमान मिलेंगे यहाँ तुम बनाना तुलसीदास की चौपाई

लिखना पढेंगे सभी ध्यान से
तुम भी तर जाओगे हम भी पार उतर जायेंगे इस जहान से

Monday, October 20, 2008

शब्दों में भी कंजूसी

आप को एक कंजूस सेठ की कथा सुनाते है

एक नगरसेठ नामी कंजूस था उसके एक साधू पधारे और उसे प्रभु आराधना का उपदेश दिया. उसने खर्च का रोना रोया तो मानसिक पूजा का तरीका समझाया.
सेठ ने रोज रात शयन से पहले मानसिक पूजा प्रारम्भ कर दी. पहिले गंगा जल से स्नान करा, पुष्प चढा. दीप दर्शन के बाद शक्कर का भोग अर्पण करने का अभिनय करता था. " जैसे चम्मच हाथ में हो शक्कर के पात्र से निकाल चढाने के साथ प्रभु भोग लगाओ" बोलता था.

एक दिन शायद सोने की हडबडी में गलती से दो बार भोग अर्पण कर बैठा.
तुरन्त ख्याल आया अररे क्या अनर्थ हो गया ? भगवान जी को तो ज्यादा शक्कर खाने से मधुमेय रोग हो जायेगा और तुरंन्त उच्चारण किया प्रभु एक चम्मच वापिस ली.
प्रभु को बड़ा गुस्सा आया और प्रगट हो उसका हाथ पकड़ बोले अरे कंजूस इस मानसिक अर्पण में भी तेरा कुछ लग रहा था क्या?

उधर कंजूस सेठ रो रहा और नाच रहा था. क्यों? इतने दिन शक्कर चढाई आज ही क्यों वापिस ली अगर पता होता की वपिस लेने से प्रभु प्रगट होते हैं तो पहिले दिन ही वापिस ले लेता

शक्कर भी लगी और प्रभु दर्शन भी देर से हुए



कैसी लगी कथा ?

इश्क की नियामत

हम अभी जवान है और मरने से डरते हैं
हम अभी जीना चाहते हैं क्यों की तुम पर मरते हैं

तुमसे मिलने को बहाने किसे चाहिए
हम तो तुम्हारी तस्वीर दिल में छुपा के रखते हैं

तुम कबूल करो या ना करो दुनिया को खबर है की
तुम और हम एक दूजे पर जाँ छिडकते हैं

आसमा है रकीब इश्क का
इसही लिए तो तुम हम कमरे में बंद रहते हैं

तुम हंसो हम देखें, हम हसें तुम देखो
येही इसरार खुदा से हम करते हैं

जख्म कोन जालिम भरना चाहता है
हम तो तुम्हारे दिए घाव इश्क की नियामत समझते हैं