Thursday, September 14, 2023
वरिष्ट जनों की दास्तान
Wednesday, September 13, 2023
हिंदी की महिमा
हिंदी हिन्द की शान।
हिंदी में भरा सर्व ज्ञान।।
हिंदी में देव का आवाहन।
हिंदी ही ग्राम विचारों का वाहन।।
राष्ट्रसंघ में अटल - सुषमा जी ने बढ़ाया मान।
मोदी जी ने जी 20 में हिंदी को दिया सम्मान।।
देवनागरी में व्यक्त होती हिंदी।
जनमानस की अभिव्यक्ति हिंदी।।
भारत के सविंधान की भाषा हिंदी।
आओ हम सभी मिल अपनाएं हिंदी।।
Monday, August 14, 2023
जिम्मेदार कोन
एक था पंडित नेहरू
और एक था जिन्ना
सत्ता की लोलुपता में
भूल गए जनता का सीना।।
लाखों के हत्यारे ये दो
आगजनी, बलात्कार के
संयोजक ये दो।
क्या इतिहास में माफी पाएंगे ये दो?
नही रुके, ये देश के गद्दार।
धारा370,
कश्मीर के टुकड़ों के
ये ही जिम्मेदार ।।
हम कैसे भूल पाएंगे
श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान
उनका नारा
एक देश, एक परचम
एक निशान एक सविधान
एक ' नरेंदर' का होश जोश था
लाल चौक पर तिरंगा फैराना
एक मारोगे हम 10 मारेंगे
उसका अहद, जोश था।
देश को ' अमिट' विश्वास था
' हर्ष ' और 'राज' का साथ था
धारा 370 को कर डाला खामोश था।
फारुक, मुफ्ती,
देश के दुश्मन देखते रह गए
कश्मीर में तिरंगे फैरते गए।
आज कश्मीर गुलजार है
पड़ोसी टुकड़ा मिलने को बेकरार है।
भारत माता की जय
Tuesday, June 20, 2023
मेरा हिंदुस्तान कहां है
मेरा हिंदुस्तान कहां है
लाल बाल पाल कुर्बान हो गए
भगत,आजाद, चिरनिद्रा में सो गए
पूछते आज
बोलो नेहरू, बोलो गांधी
मेरा हिन्दुस्तान कहां है?
जिस पर था सर्वस्व लुटाया,
मेरा वो अरमान कहां है?
बोलो नेहरू, बोलो गांधी,
मेरा हिन्दुस्तान कहां है?
सैंतालीस में भारत को बांटा,
'उनको' पाकिस्तान दे दिया;
"दो गालों पे थप्पड़ खा लो"
मुझे फालतू ज्ञान दे दिया;
मुझे बताओ यही ज्ञान तुम,
उनको' भी तो दे सकते थे;
नहीं बंटेगी भारत माता,
ये निर्णय तुम ले सकते थे;
मगर देश को छिन्न-भिन्न कर,
दुनिया भर की सीख दे गए,
हिन्दू को दो-फाड़ कर दिया,
आरक्षण की भीख दे गए!
एक अरब हिन्दू लावारिस,
कहो हमारा मान कहां है?
बोलो नेहरू, बोलो गांधी,
मेरा हिन्दुस्तान कहां है?*
'सेकुलर' राष्ट्र बनाना था तो,
बिन बंटवारे भी संभव था;
छद्म-धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र,
बिन भारत हारे भी संभव था;
'उन्हें' पालना ही था तो,
क्यों टुकड़े भारत के कर डाले?
मुझे बताओ किस की ख़ातिर,
डाके अपने ही घर डाले?
एक चीन क्या कम दुश्मन था,
बाजू पाकिस्तान बिठाया;_
कदम-कदम पर इसी पाक से,
हम सब ने फिर धोखा खाया;
जितनी सस्ती जान हमारी,
उतनी सस्ती जान कहां है?
बोलो इंदिरा, बोलो राजीव,
मेरा हिन्दुस्तान कहां है?
मुस्लिम की ज़िद पूरी कर दी,
हिन्दू का अधिकार भुलाया;
भूले सावरकर की पीड़ा,
और बोस का प्यार भुलाया;
धूल-धूसरित, जग में लज्जित,
भारत का सम्मान कर दिया;
दो लोगों की पदलोलुपता,पे
भारत बलिदान कर दिया !
उधम सिंह को पागल बोला,
मरने दिया भगत को तुमने;
चापलूस के हैं पौ-बारह,
दिखला दिया जगत को तुमने;
जो जीते उनको हरवाया,
'वल्लभ' का सम्मान कहाँ है?
बोलो राहुल, बोलो सोनिया
टूटा -फूटा जैसा भी था,
सैंतालिस में भारत पाया;
पर मुझको भी हक़ मिल जाये,
*ये तुमको हरगिज़ ना भाया;*
मुल्लों की तनख्वाह बांध दी,
मंदिर लूटे तुमने जी भर;
सेकुलर की परिभाषा गढ़ दी,
उन्हें सब्सिडी, हिन्दू पे कर !
ना पुराण ना वेद पढ़ाये,
जाने क्या बकवास पढ़ाया;
शिक्षा में घोटाला कर के,
अधकचरा इतिहास पढ़ाया;
पूछे गौरव इस भारत में,
हिन्दू की पहचान कहां है?
बोलो राहुल, बोलो सोनिया,
मेरा हिन्दुस्तान कहां है?
Sunday, May 14, 2023
माँ की यादें
माँ की यादें ............................
हर माँ की येही है कहानी
आँचल में दूध और आंखों में पानी ||
बहुत खूब तुम्हे आपनी माँ का त्याग
आज भी याद है
मुझको याद की अक्सर ऐसा होता था||
वह गर्मी की राते और बत्ती गुल
एक पंखा बिना रुके
उसके हाथो में चलता था
वो जागती सारी रात,
मैं उसकी नींदे सोता था ||
गर्मी की राते,
गुल बत्ती,
बिना रूके उसके हाथ में झलता पंखा,
.....................................मेरा भाग्य है
उसका जागना,
मेरा चैन से सोना,
उसकी नींद नहीं,
हर माँ की बीती रात है
मुझे आज भी याद है ||
मुझे याद है माँ वोह
बड़ा मुश्किल जमाना,
पिताजी का देर रात को
थका हुआ घर आना.
तुझे सारे दिन का दुखडा सुनाना
और तेरा उन्हें ढाढस बंधाना.......................
एक स्वेटर पुराना,
अभी भी मुझे बहुत प्यारा ............
हजारो धुलाई चुरा ना सकी,
उससे तेरे हाथो की खुशबु
वो स्वेटर बुनती ऐसे,
ख्वाब बुनती हो जैसे
दिन में पूरे मोहल्ले के स्वेटर बुनना..
जैसे फूलों का चुनना ,.....................
ख्वाबों का बुनना ..............................
और उसमे से मेरे इस ही
स्वेटर का चुनना ||
यह मेरी जिन्दगी का
सबसे प्यरा तोहफा है
धुल चूका हजारों बार,
फिर भी घना चौखा है ||
आज भी छुपके मैं,
बंद करके कमरा,
अलमारी खोलता हूँ
वोह तेरा बुना स्वेटर,
समेटे तेरे हाथों की खुशबू,
उसे बार बार सूंघता हूँ ||
इसे आज भी पहनता हूँ तो
" माँ" तेरी याद आती है
बंद कमरे से मैं अकेला नहीं
तेरी खुशबू भी साथ जाती है||
जब से तुझे देखा है माँ ,
मुझे भगवान भी भूल गए
तुने मुझे जन्म दिया ,
आज के झंझावात में हम
सभी शायद भूल गए
मै आज विश्व मातृदिवस पर
गौ माँ, भारत माँ,
धरती माँ को नमन करता हूँ |
व् समस्त मातृशक्ति को
सादर स्मरण करता हूँ ||
Sunday, April 2, 2023
सेवा निवृत की व्यथा
हर सेवा निवृत की जबानी है
हर घर की यही कहानी है।
रखो व्यस्त खुद को
हर काम अर्पण प्रभु को।
कुछ लिखो
कुछ पढ़ो
कुछ सुनो
कुछ सुनाओ
कुछ यात्रा, कुछ विश्राम
कुछ आराधना, कुछ ध्यान
खुश रहो, पूर्ण करो, बाकी अरमान
सेवानिवृत्ति के बाद का एक दृश्य यह भी—
जब से सेवानिवृत्त हुआ हूँ,
परिवार हो गया हूँ,
सारे परिवार की ज़रूरतों का,
आधार हो गया हूँ।
सुनसान घर का चौकीदार, ब
च्चों के लिये घोड़ा,
बहुओं के लिये बैंक,
रिश्तों को व्यवहार हो गया हूँ।
याद आने लगे सब रिश्तेदार,
तन्हाई से बचने को,
व्यस्त रहने को, समाज का
कर्णधार हो गया हूँ।
अपने ही बच्चे कहते कंजूस,
धन पर कुंडली बताते,
खुले हाथ से खर्च किया,
सबको स्वीकार हो गया हूँ।
Sunday, January 29, 2023
Wednesday, December 28, 2022
गुलदस्ता
बेशक मेरा मन
अजनबियो का मेला होगा
पर एक गुलदस्ता है
हर भांति के फूल हैं इसमें
रंग बिरंगों का मेला है।
कुछ भगवान को
कुछ प्रिय इंसान को
कुछ बिदा होते
कुछ आगवानी करते
कुछ चिढ़ाते
कुछ मनाते
कुछ नूतन जुड़ते
कुछ रूसते बिदा होते
गुल तो खिलते
झड़ते मुरझाते
यही तो इस ग्रुप की पहिचान
क्योंकि यहां तो हर दम
हंसी खुशी प्यार की बेला है
Thursday, December 22, 2022
यह दुनिया बेगानी
यह दुनिया बेगानी
बेरंगी बेमानी
मतलबियों से भरी हुई
बेवफाओं से सजी हुई
बाप बड़ा ना भैया
सबसे बड़ा रुपिया
बनावटी बदन,
लीपे पुते दर्शन
मुखोटों से ढके
मिश्री से भरे
सार रहित वचन
फिर भी चाहत हसरत
से भरपूर टूटता यह मन
क्या बेचा क्या पाया
गांव भूले शहर बसे, कीमत बड़ी चुकाई है।
जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।
बिक गया है ईमान धरम, तब घर में शानो शौकत आई है।
संतोष बेच खरीदी बैचेनी, देखो कितनी मंहगाई है।।
बीघा बेच वर्ग फुटखरीदा, ये कैसी चतुराई है।
संयुक्त परिवार के वट वृक्ष से टूटी, नई पीढ़ी मुरझाई है।।
रिश्तों में हुए स्वार्थी, हर आंख ललचाई है।
कहां गुम हो गई मिठास, जीवन में कड़वाहट सी भर आई है।।
रस्सी की बुनी खाट बेच दी, गद्दों ने जगह बनाई है।
अचार, मुरब्बे हुए गायब,आलों में सजी दवाई है।।
माटी की सोंधी महक बेच के, बनावटी खुशबू पाई है।
मिट्टी का चुल्हा बिक गया, आज गैस पे खीर जलाई है।।
पांच पैसे का लेमनचूस था,अब चाकलेट हमने पाई है।
बिका रहम, करुणामय दिल, कुटिलता समर है।।
सैलून में अब बाल कट रहे, बिका मोहल्ले का नाई है।
टीवी के सामने दिन गुजरता, बोल को तरसतीअम्मा के संग ताई है।।
मलाई बरफ के गोले बिक गये, अब तो कोक की बोतल आई है।
मिट्टी के कितने घड़े बिक गये, अब फ्रीज़ में ठंढक आई है ।।
खपरैल बेच छत डाल दी, तपस ने नींद उड़ाई है।
बरकत के कई दीये बुझा कर, रौशनी बल्बों में आई है।।
गोबर से लिपे फर्श बेच दिये, चिकने फर्श में टांग तुड़ाई है।
देहरी से गौ माता बेची, अब कुत्ते संग रात बिताई है ।
गुड शक्कर भूल गए, मधुमेह, रक्तचाप ने, हर घर में जगह पाई है।।
दादी नानी की बिकी कहानियां, दूरदर्शन ने जगह बनाई है।
बहुत तनाव है जीवन में,गृहलक्ष्मी भी दो पैग लगाई है।
मतलबी हुए हैं रिश्ते बेचारे, बची नही उनमें कोई सच्चाई है।
उबटन बिक गया, क्रीम से मुख चमक रहे , दिल पे जमी गहरी काई है।
गाँव बेच कर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।।
जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🌹🌹🌹
Sunday, December 4, 2022
शादी
शादी वोह लड्डू है
जिसे खा के लोग मुस्कुराते हैं
जीवन का आनंद लेते
परिवार बढ़ाते हैं।
बिना नमक के
सब्जी बेस्वाद होती है
कभी कभी ग्रहस्त जीवन में भी
तकरार होती है।
ए जी ओजी, सुनने को
रात में गरमागरम रोटी खाने को
तबियत बेकरार होती है।।
हमने भी यह लड्डू
खाए खिलाए हैं
जिनको नहीं मिले
यकीनन वो पछताए हैं
Saturday, November 26, 2022
विवाह स्वर्ण जयंती
"विवाह स्वर्ण जयंती"
बिना तुम्हारे काटती
हमने ना जाने कितनी सालगिरह साथ मनाई
हर वर्ष लक्ष्मी रूप में,तुम लक्ष्मी साथ आई।
प्रिय, 1972 का वोह दिन रह रह उभरता है
सोच सोच दिल जोर जोर धड़कता है
घोड़ी पर चढ़ मैं तुम्हे मनाने आया था।
लंबा चौड़ा लश्कर भी साथ लाया था।
तुम सहमी सी,
हिरणी की आंखो सी निहार रही थी।
दो दिलों में तो प्रेम कली खिल रही थी।
प्रति वर्ष यह तिथि खास होती थी।
मधुरतम मधु रात्रि की समृति
हर्षित मोहित करती थी।
प्रथम वर्ष समाप्ति पूर्व
ईश्वर की सौगात पाई थी।
पुत्र रत्न की किलकारी
हर किसी को हरसाई थी।
जिंदगी को विराम कहां
हमे तुम्हे था विश्राम कहां?
संघर्ष में बनी थी तुम संबल मेरा।
मेरी हार को भी जीत माना
मुझे बांधा विजय सेहरा।
क्षणिक खुशी के पलों को भी
तुम्हारा संबल मिला
कन्या और दित्य पुत्र प्राप्ति से
परिवार पूर्ण हो चला।
हम चलते चलते ना जाने
कहां से कहां पहुंच गए।
मैसूर आ कर थमना था तो जम गए।
विश्वास नहीं होता की
कैसे ५० वर्ष निकल गए।
आज फिर वोह ही दिन पाया है।
विवाह की स्वर्ण जयंती का अवसर आया है।
तुम बिन इस दिन का कोई अर्थ कैसे।
तुम नहीं तो विवाह सवर्ण वर्षगांठ शूल जैसे।
आज तुम्हे याद कर
तुम्हारे चित्र को
अश्रुपुष्प अर्पण करता हूं
मन पटल पर छाई
तुम्हे नमन करता हूं।
काश आज तुम होती
इस दिन बड़ी रौनक,
देवी दर्शन, दावतें होती
सभी मित्र, बंधु बांधव,
नाती पौते बलैया लेते।
आज के दिन को
५० वर्ष पूर्व जैसा जी लेते।
बंद कमरे में, अकेला
तुम्हारी यादों में खोया हूं।
आसमान को निहारता
तारों में तुम्हे खोजता हूं।
तुम्हारी तस्वीरों में मन विचर रहा
साथ बिताए हर पल स्मरण कर रहा
भरपूर गृहस्ती संसार है
लेकिन प्रिय तुम बिना बेकार है।
🌹 🌹🌹 🌹
डा श्रीकृष्ण मित्तल
Wednesday, July 13, 2022
यादें प्रियतमा की
Wednesday, June 29, 2022
दिल की तड़प
Thursday, June 2, 2022
गौसेवा हेतु आश्रुपूर्ण मिलन
प्रिय
Wednesday, February 9, 2022
मैं रोज तराना गाता हूं
मैं रोज तराना गाता हूं
Monday, November 8, 2021
अधूरी दिवाली
हमने ना जाने कितनी दिवाली साथ मनाई
हर दिवाली लक्ष्मी रूप में,लक्ष्मी साथ आई।
कितने ही आरती पूजन साथ किए।
घर दुकान कारखानों में दीप रोशन किए।
पटाखों के धमाकों और शोर में,
फूलझाड़ियों की झरझर में
मिठाई की सुगंध मिठास में
नूतन सुंदर जेवर परिधान में
हर साल तुम मन पे छा जाती थी
नही भूल पा रहा
तुम्हारा दमकता चमकता चेहरा
तुम्हारा उल्लास भरा आभास
दिवाली तो इस वर्ष भी आ गई
पर तुम ना जाने कहां खो गई।
दीप भी जलेंगे
पटाखे भी चलेंगे
मिठाई भी बटेंगी
बोनस भी बटेगा
पूजा भी होगी
लेकिन तुम..........
ना जाने कहां खो गई
यादों के झरोखों में
पलक की कोरो में
हृदय के कोनों में
ढूंढती तरसती आंखें
हर एक की तरसती भावना
मेरे मन में बसी तरसती आत्मा
वर्षों से मेरी प्यारी सखी
मेरे परिवार की एकल कड़ी
दिवाली तो आ गई
पर तुम ना जाने क्यों रूठ गई
ना जाने तुम, कहां खो गई।
यह रूखी बेरंग दिवाली
तुम्हारे बिना नही मनानी
यह अधूरी दिवाली .....












