Monday, June 2, 2008

चाँद के दीदार

तुम आये तो आया मुझे याद की गली मैं आज चाँद निकला
जाने कितने दिनों के बाद गली मैं आज चाँद निकला..........

आशिक तो माशूक में चाँद का अक्स देखता हैं
चाँद तो हुजुर का दिलबर है हर रोज़ निकलता है

आपको आयना नहीं मिला जो चाँद देखने का वक्त मिला है
चाँद का कसूर नहीं कि आशिकों को कभी कभी दिखता है

अगर इशारा हमारी और है तू हुजुर चाँद तो आप हैं
आप जब भी निकलोगे हमें खडा पाओगे हम आपके फर्मायेदार


आपका लिखा देखा तो हम लिखना भूल गए
आपके विचार समझे तो अपने विचार भूल गए

इश्क ने जालिम निकम्मा कर दिया
वर्ना आदमी हम भी थे काम के

तुम्हारी वाहवाही हमारा फक्र है, इनाम है
हम लिखते हैं तुम्हारे सदके , तुम बैठो दिल थाम के

मैं बैठ तो नहीं सकता हूँ
लिखने वक्त की मजबूरियो ने थाम लिया

आप् लिखते रहें डाक्टर स०
हम पढेंगे दिल थाम के

यह तो तुम्हारा जज्बा और रिश्ता हमें मदहोश करता है
हम तो दास्ताँ लिख गए मदहोशी में तुम्हे खुदा मान के

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